श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.18.12 
यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना
सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुरा: ।
हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा
मनोरथेनासति धावतो बहि: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव के लिए शुद्ध भक्ति भावना जागृत कर लेता है, उसके शरीर में सभी देवता और उनके महान गुण, जैसे धर्म, ज्ञान और त्याग प्रकट हो जाते हैं। इसके विपरीत, जो व्यक्ति भक्ति से रहित है और भौतिक कार्यों में व्यस्त रहता है, उसमें कोई अच्छे गुण नहीं आते। भले ही कोई व्यक्ति योगाभ्यास में कितना भी कुशल क्यों न हो और अपने परिवार और रिश्तेदारों का भली-भाँति भरण पोषण करता हो, वह अपनी मनमानी कल्पनाओं के आधार पर भगवान की बाहरी शक्ति की सेवा में तत्पर होता है। ऐसे व्यक्ति में भला अच्छे गुण कैसे आ सकते हैं?
 
One who develops pure devotion for the Supreme Personality of Godhead Vasudeva has all the demigods and their great qualities such as religion, knowledge and renunciation manifested in his body. On the contrary, one who is devoid of devotion and is engaged in material activities does not develop any good qualities. Even if one is adept in yoga practice and maintains his family and relatives well, he is engaged in the service of the external energy of the Lord by his imagination. How can such a person develop good qualities?
तात्पर्य
जैसा कि अगले श्लोक में समझाया गया है, कृष्ण सभी जीवों के मूल स्रोत हैं। भगवद् गीता (15.7) में इस बात की पुष्टि की गई है, जिसमें कृष्ण कहते हैं:

मामैवांशो जीव लोके

जीवभूतः सनातनः

मनः षष्टानींद्रियाणि

प्रकृतिस्थांनी करषति

"इस संसार में जीवित संस्थाएँ मेरे शाश्वत, खण्डित भाग हैं। संसार के कारण, वे छः इंद्रियों के साथ बहुत कठिन संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें मन भी शामिल है।" सभी जीवित संस्थाएँ कृष्ण के अभिन्न अंग हैं, और इसलिए जब वे अपनी मूल कृष्ण चेतना को पुनर्जीवित करते हैं, तो उनके पास कृष्ण के सभी अच्छे गुण कम मात्रा में होते हैं। जब कोई भक्ति सेवा की नौ प्रक्रियाओं (श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पद-सेवनम्/ अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यं आत्म-निवेदनम) में संलग्न होता है, तो उसका हृदय शुद्ध हो जाता है, और वह कृष्ण के साथ अपने संबंध को तुरंत समझ जाता है। वह तब कृष्ण चेतना के अपने मूल गुण को पुनर्जीवित करता है।

चैतन्य-चरितामृत के आदि-लीला में, अध्याय आठ में, भक्तों के कुछ गुणों का वर्णन है। उदाहरण के लिए, श्री पंडित हरिदास को बहुत अच्छे व्यवहार, सहनशील, शांतिपूर्ण, उदार और गंभीर के रूप में वर्णित किया गया है। इसके अलावा, वह बहुत मधुर बोलते थे, उनके प्रयास बहुत ही मनभावन थे, वे हमेशा धैर्यवान रहते थे, उनका सभी का सम्मान करते थे, वे हमेशा सभी के हित के लिए काम करते थे, उनका मन द्वैत भाव से मुक्त था, और वे सभी दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों से पूरी तरह रहित थे। ये सभी मूल रूप से कृष्ण के गुण हैं, और जब कोई भक्त बन जाता है तो वे अपने आप प्रकट हो जाते हैं। चैतन्य-चरितामृत के लेखक श्री कृष्णदास कवीराज का कहना है कि वैष्णव के शरीर में सभी अच्छे गुण प्रकट होते हैं और केवल यही अच्छे गुणों की उपस्थिति से कोई वैष्णव को गैर-वैष्णव से अलग कर सकता है। कृष्णदास कवीराज वैष्णव के निम्नलिखित छब्बीस अच्छे गुणों को सूचीबद्ध करते हैं: (1) वह सभी के लिए बहुत दयालु है। (2) वह किसी को अपना शत्रु नहीं मानता। (3) वह सत्यवादी है। (4) वह सभी के लिए समान है। (5) कोई भी उसमें कोई दोष नहीं पा सकता। (6) वह उदार है। (7) वह विनम्र है। (8) वह हमेशा स्वच्छ रहता है। (9) वह निष्क्रिय है। (10) वह सभी के हित के लिए काम करता है। (11) वह बहुत शांतिपूर्ण है। (12) वह हमेशा कृष्ण के सामने समर्पण कर देता है। (13) उसकी कोई भौतिक इच्छाएँ नहीं हैं। (14) वह बहुत नम्र है। (15) वह स्थिर है। (16) वह अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है। (17) वह आवश्यकता से अधिक नहीं खाता है। (18) वह भगवान की भ्रामक ऊर्जा से प्रभावित नहीं है। (19) वह सभी का सम्मान करता है। (20) वह अपने लिए कोई सम्मान नहीं चाहता है। (21) वह बहुत गंभीर है। (22) वह दयालु है। (23) वह मिलनसार है। (24) वह काव्यात्मक है। (25) वह विशेषज्ञ है। (26) वह मौन है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)