श्रृणवतां स्वा-कथाः कृष्णः
पुण्य-श्रवण-कीर्तनः
हृद्यन्ताः-स्थो ह्यभद्राणि
विधुनोति सुहृत्-सताम्
हर कोई के दिल में रहनेवाले स्वयं भगवान खुश होते हैं जब कोई व्यक्ति उनकी क्रियाकलापों को सुनता है और वे सुननेवाले के दिमाग से गंदगी को व्यक्तिगत रूप से साफ करते हैं। हृद्यन्ताः-स्थो ह्यभद्राणि विधुनोति: वे दिमाग से सभी गंदगी को धो डालते हैं। भौतिक जगत दिमाग के अंदर की गंदी चीजों के कारण होता है। अगर कोई अपने दिमाग को साफ कर सकता है, तो वह तुरंत कृष्ण चेतना के अपने मूल स्थान पर आ जाता है, और इसलिए उसका जीवन सफल हो जाता है। इसलिए पूजा की पक्ति में सभी महान संत सुनने की प्रक्रिया की बहुत जोरदार सलाह देते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने हर किसी को कृष्ण का पवित्र नाम सुनने का मौका देने के लिए हरे कृष्ण मंत्र का सामूहिक जाप शुरू किया, क्योंकि बस हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे सुनने से/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे, कोई शुद्ध हो जाता है (चेतो-दर्पण-मार्जनम्)। इसलिए हमारी कृष्ण चेतना आंदोलन दुनिया भर में हरे कृष्ण मंत्र के जाप कराने में खासतौर से व्यस्त है।
किसी के हरे कृष्ण जाप करने से उसका दिमाग साफ हो जाने के बाद, वह धीरे-धीरे कृष्ण चेतना की चौखट पर आता है और फिर भगवद-गीता, श्रीमद-भागवतम, चैतन्य-चरितामृत और भक्ति रसामृत सिंधु जैसी किताबें पढ़ता है। इस तरह, वह भौतिक दूषित विचारों से ज्यादा-से-ज्यादा शुद्ध होता जाता है। जैसा कि श्रीमद-भागवतम (1.2.18) में कहा गया है:
नष्ट-प्रायेष्वभद्रषु
नित्यं भागवत-सेवया
भगवत्युत्तम-श्लोके
भक्तिरभवति नैष्ठिकी
"नियमित रूप से भागवत को सुनने और शुद्ध भक्त की सेवा करने से, दिल को परेशान करनेवाली सभी चीजें व्यवहारिक तौर पर नष्ट हो जाती हैं, और गौरवशाली भगवान की प्रेमपूर्ण सेवा, जिसकी प्रशंसा पारलौकिक गीतों के साथ की जाती है, एक अपरिवर्तनीय तथ्य के रूप में स्थापित हो जाती है।" इस तरह, बस भगवान की ताकतवर गतिविधियों को सुनकर, भक्त का दिल भौतिक दूषित विचारों से लगभग पूरी तरह से साफ हो जाता है, और इसलिए उसका मूल स्थान एक शाश्वत सेवक के रूप में जो भगवान का अभिन्न अंग है, प्रकट हो जाता है। जब भक्त पूजा सेवा में व्यस्त होता है, भौतिक प्रकृति के भावुक और अज्ञानी तरीकों को धीरे-धीरे हराया जाता है, और फिर वह सिर्फ अच्छाई के तरीके से ही काम करता है। उस समय वह खुश होता है और धीरे-धीरे कृष्ण चेतना में आगे बढ़ता है।
सभी महान आचार्य दृढ़ता से सलाह देते हैं कि लोगों को स्वयं भगवान के बारे में सुनने का मौका दिया जाए। तब सफलता पक्की है। जितना ज्यादा हम अपने दिलों से भौतिक मोह की गंदगी साफ करते हैं, उतना ही ज्यादा हम कृष्ण के नाम, रूप, गुण, सामान और क्रियाकलापों से आकर्षित होंगे। कृष्ण चेतना आंदोलन का यही सार और तत्व है।
