जब श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु से एक वैष्णव, एक कृष्ण चेतन व्यक्ति के कर्तव्य के बारे में बताने के लिए कहा गया, तो उन्होंने तुरंत कहा, असत-संघ-त्याग-एई वैष्णव-आचार। एक वैष्णव का पहला काम उन लोगों के संग को त्यागना है जो कृष्ण के भक्त नहीं हैं और जो भौतिक चीजों - पत्नी, बच्चे, बैंक बैलेंस आदि - से बहुत अधिक जुड़े हुए हैं। प्रहलाद महाराज ने भी भगवान से प्रार्थना की कि वह भौतिकवादी जीवन शैली से जुड़े गैर-भक्तों के संग से बच सकें। यदि उन्हें किसी से लगाव रखना ही है, तो वे केवल एक भक्त के साथ जुड़ने की प्रार्थना करते हैं।
एक भक्त इंद्रियों की माँगों को अनावश्यक रूप से नहीं बढ़ाने में रुचि नहीं रखता। बेशक, जब तक कोई इस भौतिक दुनिया में है, तब तक उसके पास एक भौतिक शरीर होना चाहिए, और उसे भक्ति सेवा करने के लिए बनाए रखा जाना चाहिए। कृष्ण-प्रसाद खाकर शरीर को बहुत आसानी से बनाए रखा जा सकता है। जैसे भगवद-गीता (9.26) में कृष्ण कहते हैं:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं
यो मे भक्त्या प्रयच्छति
तदहं भक्त्य-उपहृतम
अश्नामि प्रयतात्मनः
"यदि कोई मुझे प्रेम और भक्ति के साथ एक पत्ता, एक फूल, फल या पानी अर्पित करता है, तो मैं इसे स्वीकार करूंगा।" जीभ की संतुष्टि के लिए मेनू को अनावश्यक रूप से क्यों बढ़ाया जाना चाहिए? भक्तों को यथासंभव सरलता से खाना चाहिए। अन्यथा, भौतिक चीजों के लिए लगाव धीरे-धीरे बढ़ेगा, और इंद्रियाँ बहुत शक्तिशाली होने के कारण जल्द ही अधिक से अधिक भौतिक भोग की आवश्यकता होगी। फिर जीवन का वास्तविक व्यवसाय - कृष्ण चेतना में प्रगति करना - रुक जाएगा।
