श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.17.3 
तत: सप्त ऋषयस्तत्प्रभावाभिज्ञा यां ननु तपसआत्यन्तिकी सिद्धिरेतावती भगवति सर्वात्मनि वासुदेवेऽनुपरतभक्तियोगलाभेनैवोपेक्षितान्यार्थात्मगतयो मुक्तिमिवागतां मुमुक्षव इव सबहुमानमद्यापि जटाजूटैरुद्वहन्ति ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
ध्रुवलोक के नीचे आकाश में सप्तऋषियों (मरीचि, वसिष्ठ, अत्रि आदि) का निवास है। गंगा जल के प्रभाव से परिचित होने के कारण वे आज भी अपने सिर पर गंगा जल रखते हैं। अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यही परम धन, समस्त तपस्याओं की सिद्धि और दिव्य जीवन बिताने का सर्वश्रेष्ठ साधन है। परम पुरुष भगवान की सतत भक्ति प्राप्त होने के कारण उन्होंने धर्म, अर्थ, काम और परब्रह्म से तदाकार होने (अर्थात् मोक्ष) जैसे समस्त साधनों का परित्याग कर दिया है। जिस प्रकार ज्ञानीजन यह सोचते हैं कि भगवान में तदाकार होना ही परम सत्य है, उसी प्रकार सप्तऋषि भी भक्ति को जीवन की परम सिद्धि मानते हैं।
 
The Saptarishis (Marichi, Vasishtha, Atri etc.) live in the lower regions of Dhruvaloka. Being aware of the effect of Ganga water, they wear it on their matted locks even today. Ultimately they have come to the conclusion that this is the ultimate wealth, the fulfilment of all austerities and the best means of leading a divine life. Due to constant devotion to the Supreme Personality of Godhead, they have abandoned all means like Dharma, Artha, Kama and becoming one with the Supreme Being (i.e.) Moksha. Just as the wise people think that becoming one with God is the ultimate truth, similarly the Saptarishis also consider devotion to be the ultimate attainment of life.
तात्पर्य
अनुवादकर्ता दो प्राथमिक समूहों में विभाजित हैं: निर्विशेष-वादी, या अवैयक्तिक और भक्त, या उपासक। अवैयक्तिक जीवन की आध्यात्मिक किस्मों को स्वीकार नहीं करते हैं। वे भगवान के सर्वोच्च अस्तित्व में अपने ब्राह्मण सुविधा (ब्रह्मज्योति) में विलय करना चाहते हैं। हालांकि, भक्त सर्वोच्च भगवान की पारलौकिक गतिविधियों में भाग लेने की इच्छा रखते हैं। ऊपरी ग्रह प्रणाली में, सबसे ऊपर का ग्रह ध्रुवलोक है, और ध्रुवलोक के नीचे सात ग्रह हैं, जिन पर मारीची, वशिष्ठ और अत्रि से शुरू होकर महान संतों का कब्जा है। ये सभी संत भक्ति सेवा को जीवन की सर्वोच्च पूर्णता मानते हैं। इसलिए वे सभी अपने सिर पर गंगा का पवित्र पानी रखते हैं। यह श्लोक साबित करता है कि जिसने भक्ति सेवा के मंच को प्राप्त कर लिया है, उसके लिए कुछ और महत्वपूर्ण नहीं है, यहाँ तक कि कथित मुक्ति (कैवल्य) भी। श्रील श्रीधर स्वामी कहते हैं कि केवल भगवान की शुद्ध भक्ति सेवा प्राप्त करने से ही कोई अन्य सभी व्यस्तताओं को महत्वहीन समझकर त्याग सकता है। प्रबोधानंद सरस्वती अपने कथन की पुष्टि इस प्रकार करते हैं:

कैवल्य नरकायते त्रि-दश-पूर आकाश-पुष्पायते

दुर्दान्तेन्द्रिय-काल-सर्प-पटली प्रोत्खाता-दंष्ट्रायते

विश्व पूर्ण-सुखायते विधि-महेन्द्रादिश च कीटायते

यत् कारुण्य-कटाक्ष-वैभववता तां गौरम एव स्तुमः

(चैतन्य-चंद्रामृत 5)

श्री चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति-योग की प्रक्रिया को पूर्ण रूप से घोषित और प्रसारित किया है। नतीजतन, जिसने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरण कमलों की शरण ली है, उसके लिए मायावादियों की सर्वोच्च पूर्णता, कैवल्य या सर्वोच्च के साथ एक हो जाना, नरक माना जाता है, स्वर्गीय ग्रहों में पदोन्नत होने की कर्मियों की आकांक्षा की बात तो क्या कहें। भक्त ऐसे लक्ष्यों को बेकार काल्पनिकता मानते हैं। योगी भी हैं, जो अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे भक्ति सेवा के स्तर पर आए बिना कभी भी सफल नहीं हो सकते। इंद्रियों की तुलना जहरीले सांपों से की जाती है, लेकिन भगवान की सेवा में लगे भक्त की इंद्रियाँ ऐसे सांपों की तरह होती हैं जिनके जहरीले नुकीले उखाड़ दिए गए होते हैं। योगी अपनी इंद्रियों को दबाने की कोशिश करता है, लेकिन विश्वामित्र जैसे महान रहस्यवादी भी इस प्रयास में विफल हो जाते हैं। विश्वामित्र को उनकी इंद्रियों ने जीत लिया था जब वे अपने ध्यान के दौरान मेनका से मोहित हो गए थे। बाद में उसने शकुंतला को जन्म दिया। विश्व के सबसे बुद्धिमान व्यक्ति, इसलिए भक्ति-योगी हैं, जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (6.47) में पुष्टि की है:

योगिनाम् अपि सर्वेषां

मद्-गतेनान्तरात्मना

श्रद्धावान् भजते यो माम्

स मे युक्ततमो मतः

"सभी योगियों में से, जो हमेशा मुझ में बड़ी आस्था के साथ रहता है, मुझे पारलौकिक प्रेममयी सेवा में पूजता है, वह योग में मेरे साथ सबसे निकट से जुड़ा हुआ है और सभी में सर्वोच्च है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)