कैवल्य नरकायते त्रि-दश-पूर आकाश-पुष्पायते
दुर्दान्तेन्द्रिय-काल-सर्प-पटली प्रोत्खाता-दंष्ट्रायते
विश्व पूर्ण-सुखायते विधि-महेन्द्रादिश च कीटायते
यत् कारुण्य-कटाक्ष-वैभववता तां गौरम एव स्तुमः
(चैतन्य-चंद्रामृत 5)
श्री चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति-योग की प्रक्रिया को पूर्ण रूप से घोषित और प्रसारित किया है। नतीजतन, जिसने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरण कमलों की शरण ली है, उसके लिए मायावादियों की सर्वोच्च पूर्णता, कैवल्य या सर्वोच्च के साथ एक हो जाना, नरक माना जाता है, स्वर्गीय ग्रहों में पदोन्नत होने की कर्मियों की आकांक्षा की बात तो क्या कहें। भक्त ऐसे लक्ष्यों को बेकार काल्पनिकता मानते हैं। योगी भी हैं, जो अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे भक्ति सेवा के स्तर पर आए बिना कभी भी सफल नहीं हो सकते। इंद्रियों की तुलना जहरीले सांपों से की जाती है, लेकिन भगवान की सेवा में लगे भक्त की इंद्रियाँ ऐसे सांपों की तरह होती हैं जिनके जहरीले नुकीले उखाड़ दिए गए होते हैं। योगी अपनी इंद्रियों को दबाने की कोशिश करता है, लेकिन विश्वामित्र जैसे महान रहस्यवादी भी इस प्रयास में विफल हो जाते हैं। विश्वामित्र को उनकी इंद्रियों ने जीत लिया था जब वे अपने ध्यान के दौरान मेनका से मोहित हो गए थे। बाद में उसने शकुंतला को जन्म दिया। विश्व के सबसे बुद्धिमान व्यक्ति, इसलिए भक्ति-योगी हैं, जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (6.47) में पुष्टि की है:
योगिनाम् अपि सर्वेषां
मद्-गतेनान्तरात्मना
श्रद्धावान् भजते यो माम्
स मे युक्ततमो मतः
"सभी योगियों में से, जो हमेशा मुझ में बड़ी आस्था के साथ रहता है, मुझे पारलौकिक प्रेममयी सेवा में पूजता है, वह योग में मेरे साथ सबसे निकट से जुड़ा हुआ है और सभी में सर्वोच्च है।"
