महाराज उत्तानपाद के सुविख्यात पुत्र ध्रुव महाराज को परम-ईश्वर का परम भक्त कहा जाता है, क्योंकि उनकी भक्ति-निष्ठा दृढ़ थी। यह जानते हुए कि गंगाजल भगवान विष्णु के चरणकमल को पखारता है, वे उस जल को अपने लोक में ही रहते हुए आज तक अपने शिर पर भक्तिपूर्वक धारण कर रहे हैं। चूँकि वे अपने अन्तस्थल (हृदय) में श्रीकृष्ण का निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं, फलत: वे अत्यन्त उत्कंठित रहते हैं, उनके अर्ध-निमीलित नेत्रों से अश्रु की धारा बह रही है और उनका शरीर पुलकायमान रहता है।
Dhruva Maharaja, the renowned son of Maharaja Uttanapada, is said to be the best devotee of the Supreme Lord because his devotion was strong. Knowing that the water of the Ganges washes the lotus feet of Lord Visnu, he wears that water on his head with devotion even today while he is in his own world. Since he is constantly thinking of Sri Krishna in his heart, he is very anxious, and tears flow from his half-closed eyes and his body is trembling.
तात्पर्य
जब कोई व्यक्ति ईश्वर की भक्ति को दृढ़ निष्ठा से पालन करता है, तो वो 'वीर-व्रत' कहलाता है, जो पूर्णतया निर्धारित होता है। ऐसा भक्त सेवा की भक्ति में अपनी परमानंदता लगातार बढ़ाता है। इस प्रकार जैसे ही वो भगवान विष्णु का स्मरण करता है, उसकी आँखों से आँसू निकलने लगते हैं। यह एक महान भक्त का लक्षण है। महाराज ध्रुव उस भक्ति परमानंद में साधे हुए थे, और श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी हमें परम आनंद का एक व्यावहारिक उदाहरण दिया, जब वो जगन्नाथ पुरी में रहते थे। वहाँ के उनके समय का पूरा वर्णन चैतन्य चरितामृत में है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥