न यस्य मायागुणचित्तवृत्तिभि-र्निरीक्षतो ह्यण्वपि दृष्टिरज्यते ।
ईशे यथा नोऽजितमन्युरंहसांकस्तं न मन्येत जिगीषुरात्मन: ॥ १९ ॥
अनुवाद
हम अपने क्रोध के वेग को नियंत्रित नहीं कर पाते, इसलिए जब हम भौतिक वस्तुओं को देखते हैं तो उनके प्रति आकर्षण या विकर्षण महसूस किए बिना नहीं रह पाते। लेकिन परमेश्वर कभी भी इस तरह प्रभावित नहीं होते। हालाँकि वे सृष्टि, पालन और विनाश के उद्देश्य से भौतिक दुनिया पर दृष्टि डालते हैं, फिर भी वे ज़रा सा भी प्रभावित नहीं होते। इसलिए जो अपनी इंद्रियों के वेग पर विजय प्राप्त करना चाहता है, उसे श्रीभगवान के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए। तभी वह विजयी होगा।
We cannot control the impulse of our anger, so when we see material objects we cannot help being attracted or repelled by them. But the Supreme Lord is never affected in this way. Although He looks upon this material world in order to create, maintain and destroy it, He is not affected by it in the least. Therefore, he who wants to conquer the impulse of his senses must take shelter of the lotus feet of the Supreme Lord. Then he will be victorious.
तात्पर्य
असीम पुरुषोत्तम सदैव अकल्पनीय सामर्थ्यों से संपन्न रहते हैं। हालाँकि उनकी दृष्टि पड़ने से ही सृष्टि का सृजन हो जाता है, फिर भी वो भौतिक प्रकृत्ति के गुणों से प्रभावित नहीं होते हैं। उनके शाश्वत पारमार्थिक पद के कारण, जब भगवान इस भौतिक संसार में प्रकट होते हैं, तो भौतिक प्रकृति के गुण उन्हें प्रभावित नहीं कर सकते। इसलिए परम प्रभु को पारमार्थिक कहा जाता है, और जो कोई भी भौतिक प्रकृति के गुणों के प्रभाव से सुरक्षित रहना चाहता है, उसे उनकी शरण लेनी चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥