श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.17.11 
तत्रापि भारतमेव वर्षं कर्मक्षेत्रमन्यान्यष्ट वर्षाणि स्वर्गिणां पुण्यशेषोपभोगस्थानानि भौमानि स्वर्गपदानि व्यपदिशन्ति ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
नव वर्षों में से, भारतवर्ष के नाम से जाना जाने वाला भूभाग कर्मक्षेत्र माना जाता है। विद्वान और संत कहते हैं कि अन्य आठ वर्ष बहुत ही पुण्यात्माओं के लिए हैं। जब वो स्वर्गलोक से वापस आते हैं, तो उन आठ भू-क्षेत्रों में अपने शेष पुण्यों का फल भोगते हैं।
 
Out of the nine years, the land called Bharatvarsh is considered the Karmkshetra. Scholars and saints say that the other eight years are meant for extremely pious souls. After returning from heaven, they enjoy the fruits of their remaining pious deeds in these eight lands.
तात्पर्य
स्वर्ग के आनंद के स्थानों को तीन समूहों में बांटा गया है: आकाशीय स्वर्गीय ग्रह, पृथ्वी पर स्वर्गीय स्थान और निचले क्षेत्रों में पाया जाने वाला बिला स्वर्गीय स्थान। स्वर्गीय स्थानों के इन तीन वर्गों (भौम-स्वर्ग-पद-नि) में से, पृथ्वी पर स्वर्गीय स्थान भारत-वर्ष से अलग आठ वर्ष हैं। भगवद्-गीता (9.21) में कृष्ण कहते हैं, क्षीणे पुण्ये मृत्य-लोकं विशन्ति : जब स्वर्गीय ग्रहों में रहने वाले व्यक्ति अपने धर्म कर्मों का परिणाम समाप्त कर लेते हैं, तो वे इस पृथ्वी पर वापस आ जाते हैं। इस तरह, उन्हें स्वर्गीय ग्रहों पर ऊपर उठाया जाता है, और फिर वे फिर से पृथ्वी के ग्रहों पर गिर जाते हैं। इस प्रक्रिया को ब्रह्मांड भ्रमण कहा जाता है, जो पूरे ब्रह्मांड में ऊपर और नीचे भटकना है। जो बुद्धिमान हैं - दूसरे शब्दों में, जो अपनी बुद्धि नहीं खोते हैं - वे खुद को ऊपर और नीचे भटकने की इस प्रक्रिया में शामिल नहीं करते हैं। वे भगवान की भक्ति सेवा लेते हैं ताकि वे अंततः इस ब्रह्मांड के आवरण को भेद सकें और आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश कर सकें। फिर वे वैकुण्ठलोक या उससे भी ऊपर, कृष्णलोक (गोलोक वृंदावन) नामक ग्रहों में से एक पर स्थित होते हैं। एक भक्त कभी भी स्वर्गीय ग्रहों पर पदोन्नत होने और फिर नीचे आने की प्रक्रिया में नहीं फंसता है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:

एआई रूपे ब्रह्मांड भ्रामिते कोण भाग्यवान जीव

गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाया भक्ति-लता-बीज

सभी जीवित संस्थाओं में से पूरे ब्रह्मांड में भटकती है, जो सबसे भाग्यशाली है ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के एक प्रतिनिधि के संपर्क में आता है और इस तरह भक्ति सेवा करने का अवसर प्राप्त करता है।

जो ईमानदारी से कृष्ण के पक्ष की तलाश कर रहे हैं, वे एक गुरु के संपर्क में आते हैं, जो कृष्ण के एक वास्तविक प्रतिनिधि हैं। मानसिक अटकलों में लिप्त मायावादी और कर्मी जो अपने कार्यों के परिणामों की इच्छा रखते हैं, वे गुरु नहीं बन सकते। एक गुरु कृष्ण का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि होना चाहिए जो कृष्ण के निर्देशों को बिना किसी बदलाव के वितरित करता है। इस प्रकार केवल सबसे भाग्यशाली व्यक्ति गुरु के संपर्क में आते हैं। जैसा कि वैदिक साहित्यों में पुष्टि की जाती है, तद-विज्ञानार्थम सा गुरुम एवाभिगच्छेत : आध्यात्मिक दुनिया के मामलों को समझने के लिए एक गुरु को खोजना होगा। श्रीमद-भागवतम भी इस बिंदु की पुष्टि करता है। तस्माद गुरुम प्रपद्येत जीज्ञासुः श्रेय उत्तमम : जो आध्यात्मिक दुनिया में गतिविधियों को समझने में बहुत रुचि रखता है उसे एक गुरु की खोज करनी चाहिए - कृष्ण का एक वास्तविक प्रतिनिधि। इसलिए दृष्टि के सभी कोणों से, गुरु शब्द विशेष रूप से कृष्ण के वास्तविक प्रतिनिधि के लिए है और किसी और के लिए नहीं। पद्म पुराण में कहा गया है, अवैष्णवो गुरु न स्यात : जो वैष्णव नहीं है, या जो कृष्ण का प्रतिनिधि नहीं है, वह गुरु नहीं हो सकता। यदि वह कृष्ण का प्रतिनिधि नहीं है तो सबसे योग्य ब्राह्मण भी गुरु नहीं बन सकता। ब्राह्मणों को छह प्रकार की शुभ योग्यताएँ प्राप्त करनी होती हैं: वे बहुत विद्वान विद्वान (पाठन) और बहुत योग्य शिक्षक (पाठन) बन जाते हैं; वे भगवान या देवताओं (यजन) की पूजा करने में विशेषज्ञ बन जाते हैं, और वे दूसरों को सिखाते हैं कि इस पूजा को कैसे निष्पादित किया जाए (याजन); वे दूसरों से भिक्षा प्राप्त करने के लिए खुद को वास्तविक व्यक्ति के रूप में अर्हता प्राप्त करते हैं (प्रतिग्रह), और वे दान में धन वितरित करते हैं (दान)। फिर भी इन योग्यताओं वाला ब्राह्मण जब तक वह कृष्ण का प्रतिनिधि नहीं होता (गुरु न स्यात) तब तक गुरु नहीं बन सकता। वैष्णवः श्व-पचो गुरुः : लेकिन एक वैष्णव, सर्वोच्च व्यक्तित्व ईश्वर विष्णु का एक वास्तविक प्रतिनिधि, एक गुरु बन सकता है भले ही वह श्व-पचो है, जो कुत्ते खाने वालों के परिवार का सदस्य है। स्वर्गीय ग्रहों (स्वर्ग-लोका) के तीन डिवीजनों में से, भौम-स्वर्ग को कभी-कभी भारत-वर्ष में कश्मीर के रूप में जाना जाने वाला भूमि क्षेत्र के रूप में स्वीकार किया जाता है। इस क्षेत्र में निश्चित रूप से भौतिक इंद्रिय भोग के लिए अच्छी सुविधाएँ हैं, लेकिन यह एक शुद्ध पारलौकिकवादी का व्यवसाय नहीं है। रूप गोस्वामी एक शुद्ध पारलौकिकवादी की व्यस्तता का वर्णन इस प्रकार करते हैं:

अनायासित-शुन्यम

ज्ञान-कर्मद्य-अनावृतं

अनुकोलेना कृष्णानु-

शीलनम भक्ति उत्तमा

"किसी को भगवान कृष्ण को अनुकूलता से और भौतिक लाभ या सांसारिक गतिविधियों या दार्शनिक अटकलों के माध्यम से धन या लाभ के बिना अनुवादी प्रेम सेवा प्रदान करनी चाहिए। इसे शुद्ध भक्ति सेवा कहा जाता है।" जो लोग सिर्फ उन्हें प्रसन्न करने के लिए कृष्ण की भक्ति सेवा में पूरी तरह से संलग्न हैं, उन्हें स्वर्गीय स्थानों के तीन भागों में कोई दिलचस्पी नहीं है, जैसे कि दिव्य-स्वर्ग, भौमा-स्वर्ग और बिला-स्वर्ग।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)