श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.16.6 
यस्मिन्नव वर्षाणि नवयोजनसहस्रायामान्यष्टभिर्मर्यादागिरिभि: सुविभक्तानि भवन्ति ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
जम्बूद्वीप में नौ खण्ड हैं, जिनमें से प्रत्येक की लम्बाई ९,००० योजन (७२,००० मील) है। इन खण्डों की सीमा पर आठ पर्वत हैं, जो उन्हें अच्छी तरह से विभाजित करते हैं।
 
There are nine varshas (sections) in Jambudweep, each of which is 9,000 yojanas (72,000 miles) long. There are eight mountains marking the boundaries of these sections, which separate them well.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर वायु पुराण से निम्नलिखित उद्धरण देते हैं, जिसमें हिमालय से शुरू होने वाले विभिन्न पर्वतों के स्थानों का वर्णन किया गया है।

धनुर्वत संस्थिते ज्ञेय द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे; दीर्घाणि तत्र चत्वरि चतुराश्रम इलावृतम् इति दक्षिणोत्तरे भारतोत्तर-कुरु-वर्षे चत्वरि किम्पुरुष-हरिवर्ष-रम्यक-हिरण्मयनि वर्षनि वर्षनि निला-निषाधयोस तिरश्चिन् इभूय समुद्र-प्रविष्टयोः संलग्नत्वम् अंगिककृत्य भद्रश्व-केतुमालयोर अपि धनुर-आकृतित्वम्; अतस तयोर दीर्घ्यता एव मध्ये संकुचितत्वेन नव-सहस्रायमत्वम्; इल्वास्य तू मेरो-सकाट कैटुर-डिकु-नवा-साहासरतवामतवामतवत वस्तुतस वस्तुतस टीवी इल्वास्टा-भद्रा-केटुमलामन कैटस-त्रि-त्रि-साहास्यातसत्वामत्वामत्वामत्वामत्वामत्वामतवाम।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)