श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  5.16.20-21 
तावदुभयोरपि रोधसोर्या मृत्तिका तद्रसेनानुविध्यमाना वाय्वर्कसंयोगविपाकेन सदामरलोकाभरणं जाम्बूनदं नाम सुवर्णं भवति ॥ २० ॥
यदु ह वाव विबुधादय: सह युवतिभिर्मुकुटकटककटिसूत्राद्याभरणरूपेण खलु धारयन्ति ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
जम्बू-नदी के दोनों किनारों की मिट्टी जामुन के रस से सींची जाती है और फिर हवा और धूप से सूख जाती है, जिससे जाम्बू-नद नामक सोना पैदा होता है। स्वर्ग के लोग इस सोने का उपयोग विभिन्न प्रकार के गहनों के लिए करते हैं। इसलिए स्वर्गलोक के सभी निवासी और उनकी युवा पत्नियाँ सोने के मुकुट, चूड़ियाँ और कमरबंद से सजी रहती हैं और इस तरह वे जीवन का आनंद लेते हैं।
 
The mud on both banks of the Jambu river, when soaked in the flowing juice of the jamun fruit and then dried due to air and sunlight, produces a large quantity of gold called Jambu-nad. The inhabitants of heaven use this gold for various ornaments. As a result, all the inhabitants of heaven and their young wives are adorned with golden crowns, bangles and belts. In this way, they all enjoy life.
तात्पर्य
परमेश्वर के बंदोबस्त से कुछ ग्रहों पर नदियाँ अपने किनारों पर सोना पैदा करती हैं। इस पृथ्वी के गरीब निवासी अपने अधूरे ज्ञान के कारण एक तथाकथित भगवान के चंगुल में फंसे हैं जो थोड़ी मात्रा में सोना पैदा कर सकता है। हालाँकि, यह समझा जाता है कि इस भौतिक संसार में एक ऊँची ग्रह प्रणाली में, जम्बू-नदी के किनारों पर कीचड़ जम्बू के जूस के साथ मिलती है, हवा में धूप के साथ प्रतिक्रिया करती है और स्वचालित रूप से भारी मात्रा में सोना पैदा करती है। इस प्रकार वहाँ के पुरुष और महिलाएँ विभिन्न स्वर्ण आभूषणों से सजते हैं और बहुत अच्छे लगते हैं। दुर्भाग्य से, पृथ्वी पर सोने की इतनी कमी है कि दुनिया की सरकारें इसे रिज़र्व में रखने और कागज़ी मुद्रा जारी करने की कोशिश करती हैं। क्योंकि उस मुद्रा को सोने का समर्थन नहीं मिलता है, इसलिए वे कागज जो वे पैसे के रूप में वितरित करते हैं, बेकार हैं, लेकिन फिर भी पृथ्वी पर लोग भौतिक उन्नति पर बहुत गर्व करते हैं। आधुनिक समय में, लड़कियों और महिलाओं के पास सोने के बजाय प्लास्टिक से बने आभूषण हैं, और सुनहरे बर्तनों के बजाय प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग किया जाता है, फिर भी लोग अपनी भौतिक संपत्ति पर बहुत गर्व करते हैं। इसलिए इस युग के लोगों का वर्णन मंदाह सुमंद-मतयो मंदा-भाग्या ह्य उपद्रुतः (भाग. 1.1.10) के रूप में किया गया है। दूसरे शब्दों में, वे बेहद बुरे हैं और भगवान के वैभव को समझने में धीमे हैं। उनका वर्णन सुमंद-मतयः के रूप में किया गया है क्योंकि उनकी अवधारणाएँ इतनी अपंग हैं कि वे एक ब्लफ़र को स्वीकार करते हैं जो थोड़ा सोना पैदा करके उसे भगवान बना देता है। क्योंकि उनके पास अपने कब्ज़े में कोई सोना नहीं है, वे वास्तव में गरीबी से त्रस्त हैं, और इसलिए उन्हें दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है। कभी-कभी ये दुर्भाग्यपूर्ण लोग भाग्यशाली स्थिति प्राप्त करने के लिए स्वर्गीय ग्रहों में पदोन्नत होना चाहते हैं, जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है, लेकिन भगवान के शुद्ध भक्त ऐसी समृद्धि में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं रखते हैं। वास्तव में, भक्त कभी-कभी सोने के रंग की तुलना चमकीले सुनहरे मल से करते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने भक्तों को निर्देश दिया है कि वे स्वर्ण के आभूषणों और खूबसूरती से सजी महिलाओं से आकर्षित न हों। न धनं न जनं न सुन्दरीम्: एक भक्त को सोने, सुंदर महिलाओं या कई अनुयायियों की प्रतिष्ठा से आकर्षित नहीं होना चाहिए। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोपनीय रूप से प्रार्थना की, मम जन्मनी जन्मानीश्वरे भवताद् भक्तिर अहैतुकी त्वयी: "हे मेरे भगवान, कृपया मुझे आपकी भक्ति सेवा का आशीर्वाद दें। मुझे कुछ और नहीं चाहिए।" एक भक्त इस भौतिक दुनिया से मुक्ति पाने की प्रार्थना कर सकता है। यही उसकी एकमात्र आकांक्षा है।

अयी नंद-तनूज किंकरम्

पतितं माम् विषमे भवांभूधौ

कृपया तव पाद-पंकज-

स्थित-धूलि-सदृशं विचिंतय

विनम्र भक्त बस भगवान से प्रार्थना करता है, "कृपया मुझे भौतिक संसार से उठाओ, जो भौतिक वैभव की किस्मों से भरा है, और मुझे आपके चरणकमलों के आश्रय में रखो।"

श्रील नरोत्तम दास ठाकुर प्रार्थना करते हैं:

हा हा प्रभु नंद-सुता, वृषभानु-सुता-युता,

करुणा कराह एई-बार

नरोत्तम-दास काया, ना ठेलिहा रांगा-पाया,

तोमा विना कै आछे आमारा

हे मेरे स्वामी, हे नंद महाराज के पुत्र, अब आप अपने जीवनसाथी वृषभानु की पुत्री श्रीमती राधारानी के साथ मेरे सामने खड़े हैं। कृपया मुझे अपने चरणकमलों की धूल के रूप में स्वीकार करें। कृपया मुझे दूर मत करो, क्योंकि मेरे पास कोई और आश्रय नहीं है।"

इसी तरह, प्रबोधानंद सरस्वती बताते हैं कि स्वर्णिम हेलमेट और अन्य आभूषणों से सजे हुए देवताओं की स्थिति एक भ्रम (त्रि-दश-पुर आकाश-पुष्पायते) से बेहतर नहीं है। एक भक्त कभी भी ऐसी समृद्धि से आकर्षित नहीं होता है। वह बस भगवान के चरणकमलों की धूल बनने की इच्छा रखता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)