अयी नंद-तनूज किंकरम्
पतितं माम् विषमे भवांभूधौ
कृपया तव पाद-पंकज-
स्थित-धूलि-सदृशं विचिंतय
विनम्र भक्त बस भगवान से प्रार्थना करता है, "कृपया मुझे भौतिक संसार से उठाओ, जो भौतिक वैभव की किस्मों से भरा है, और मुझे आपके चरणकमलों के आश्रय में रखो।"
श्रील नरोत्तम दास ठाकुर प्रार्थना करते हैं:
हा हा प्रभु नंद-सुता, वृषभानु-सुता-युता,
करुणा कराह एई-बार
नरोत्तम-दास काया, ना ठेलिहा रांगा-पाया,
तोमा विना कै आछे आमारा
हे मेरे स्वामी, हे नंद महाराज के पुत्र, अब आप अपने जीवनसाथी वृषभानु की पुत्री श्रीमती राधारानी के साथ मेरे सामने खड़े हैं। कृपया मुझे अपने चरणकमलों की धूल के रूप में स्वीकार करें। कृपया मुझे दूर मत करो, क्योंकि मेरे पास कोई और आश्रय नहीं है।"
इसी तरह, प्रबोधानंद सरस्वती बताते हैं कि स्वर्णिम हेलमेट और अन्य आभूषणों से सजे हुए देवताओं की स्थिति एक भ्रम (त्रि-दश-पुर आकाश-पुष्पायते) से बेहतर नहीं है। एक भक्त कभी भी ऐसी समृद्धि से आकर्षित नहीं होता है। वह बस भगवान के चरणकमलों की धूल बनने की इच्छा रखता है।
