श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 15: राजा प्रियव्रत के वंशजों का यश-वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.15.7 
स वै स्वधर्मेण प्रजापालन पोषणप्रीणनोपलालनानुशासनलक्षणेनेज्यादिना च भगवति महापुरुषे परावरे ब्रह्मणि सर्वात्मनार्पितपरमार्थलक्षणेन ब्रह्मविच्चरणानुसेवयाऽऽपादितभगवद्‍भक्तियोगेन चाभीक्ष्णश: परिभावितातिशुद्ध मतिरुपरतानात्म्य आत्मनि स्वयमुपलभ्यमानब्रह्मात्मानुभवोऽपि निरभिमान एवावनिमजूगुपत् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
राजा गय ने अपनी प्रजा को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की, ताकि कोई भी अवांछित तत्व उनकी निजी संपत्ति को नुकसान न पहुँचा सके। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि सभी नागरिकों को पर्याप्त भोजन मिले। कभी-कभी, वह अपने नागरिकों को प्रसन्न रखने के लिए उपहार भी बाँटते थे। इसके अलावा, वह कभी-कभी सभाएँ बुलाते थे और मधुर वचनों से नागरिकों को संतुष्ट करते थे। वे उन्हें उच्चकोटि के नागरिक बनने की शिक्षा भी देते थे। राजा गय के शासन की ये कुछ विशेषताएँ थीं। इनके अलावा, राजा गय एक गृहस्थ थे, जो गृहस्थ जीवन के नियमों का कड़ाई से पालन करते थे। वे यज्ञ करते थे और भगवान के समर्पित भक्त थे। उन्हें महापुरुष कहा जाता था क्योंकि एक राजा के रूप में उन्होंने नागरिकों को सभी सुविधाएँ प्रदान कीं और एक गृहस्थ के रूप में उन्होंने सभी कर्तव्यों का पालन किया, जिसके परिणामस्वरूप वे अंततः भगवान के परम भक्त बन गए। एक भक्त के रूप में, वे अन्य भक्तों का सम्मान करने और भगवान की सेवा करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। यह भक्ति-योग की प्रक्रिया है। इन दिव्य कर्मों के कारण, राजा गय हमेशा शारीरिक पहचान से मुक्त रहे। वे ब्रह्म साक्षात्कार में डूबे रहने के कारण हमेशा प्रमुदित रहते थे। उन्हें सांसारिक दुखों का अनुभव नहीं हुआ। सभी प्रकार से पूर्ण होने के बावजूद, वे न तो घमंड करते थे और न ही राज्य करने के लिए लालायित रहते थे।
 
King Gaya provided complete security to his subjects so that their personal property was not damaged by unwanted elements. He also saw to it that the subjects had sufficient food (this is “nutrition”). Sometimes he gave alms to keep the subjects happy (this is called “preenan”). Sometimes he called meetings of the subjects and satisfied them with soft words (this is called “upalan”). He taught them to become high-class citizens (this is called “anushaasan”). King Gaya had such special qualities. Along with all this, King Gaya was a householder and strictly followed all the rules of household life. He performed sacrifices and was a devoted devotee of Shri Bhagavan. He was called a great man because as a king he provided all facilities to the citizens and as a householder he performed all duties. As a result, he ultimately became a great devotee of the Lord. As a devotee, he was always ready to respect all devotees and serve the Lord. This is the process of bhaktiyoga. Due to these divine activities, King Gaya was always free from the feeling of embodiment. He was always joyful because he was absorbed in realization of Brahman. He never had to experience material remorse. Although he was complete in all respects, he was neither proud nor eager to rule.
तात्पर्य
जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता में कहा है, जब वे पृथ्वी पर उतरते हैं, तो उनका दो तरह का व्यवसाय होता है - धर्मनिष्ठों की रक्षा करना और राक्षसों का नाश करना (परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम)। चूँकि राजा परमेश्वर श्रीहरि का प्रतिनिधि होता है, इसलिए उसे कभी-कभी नर-देव कहा जाता है, यानी मनुष्य के रूप में ईश्वर। वैदिक आज्ञाओं के अनुसार, भौतिक पटल पर उनकी पूजा भगवान के रूप में की जाती है। परम प्रभु के प्रतिनिधि के रूप में, राजा का कर्तव्य था कि वह नागरिकों की पूर्ण रूप से रक्षा करे ताकि वे भोजन और सुरक्षा के लिए व्याकुल न हों और आनन्दित रहें। राजा उनके लाभ के लिए हर चीज़ की आपूर्ति करेगा, और इस कारण वह कर लगाता था। यदि राजा या सरकार नागरिकों पर अन्यथा कर लगाती है, तो वह नागरिकों की पापपूर्ण गतिविधियों के लिए जिम्मेदार हो जाती है। कलि-युग में, राजतंत्र समाप्त कर दिया गया क्योंकि स्वयं राजा कलि-युग के प्रभाव के अधीन हैं। रामायण से यह समझा जाता है कि जब बिभीषण भगवान रामचन्द्र के मित्र बने, तो उन्होंने वचन दिया कि यदि संयोगवश या इच्छा से वह भगवान रामचन्द्र के साथ मित्रता के नियमों को तोड़ते हैं, तो वह कलि-युग में एक ब्राह्मण या राजा बनेंगे। इस युग में, जैसा कि बिभीषण ने संकेत दिया, ब्राह्मण और राजा दोनों ही दयनीय स्थिति में हैं। वास्तव में इस युग में कोई राजा या ब्राह्मण नहीं हैं, और उनकी अनुपस्थिति के कारण पूरा संसार अराजक स्थिति में है और हमेशा विपत्ति में है। वर्तमान मानकों की तुलना में, महाराजा गया भगवान विष्णु के एक सच्चे प्रतिनिधि थे; इसलिए उन्हें महापुरुष के रूप में जाना जाता था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)