श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 15: राजा प्रियव्रत के वंशजों का यश-वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.15.4 
य आत्मविद्यामाख्याय स्वयं संशुद्धो महापुरुषमनुसस्मार ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
राजा प्रतीह ने आत्म-साक्षात्कार के सिद्धांतों को खुद ही फैलाया। इस तरह, न केवल वे शुद्ध हुए, बल्कि वे भगवान विष्णु के महान भक्त बन गए और उनका साक्षात दर्शन किया।
 
Raja Pratih himself spread the principles of self-realization. Thus being purified, he became a great devotee of the Supreme Lord Vishnu and personally experienced him.
तात्पर्य
अनुस्मार शब्द बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। ईश्वर चेतना न तो काल्पनिक है और न ही बनावटी। भक्त जो शुद्ध और उन्नत है, ईश्वर को उसी रूप में पाता है जैसे वे हैं। महाराज प्रतीहा ने ऐसा ही किया था। और भगवान विष्णु के प्रत्यक्ष साक्षात्कार के कारण ही उन्होंने आत्म-साक्षात्कार का प्रचार किया और एक प्रचारक बने। एक सच्चा प्रचारक कभी भी दिखावटी नहीं हो सकता है। उन्हें सर्वप्रथम भगवान विष्णु को उसी रूप में साक्षात्कार करना होगा जैसे वो हैं। जैसा कि भगवद-गीता (4.34) में पुष्टि की गई है कि – उपदेश्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनः तत्व-दर्शिनः: "जिसने सत्य को देखा है, वह ज्ञान दे सकता है।" तत्व-दर्शी शब्द उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जिसने ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व का पूरी तरह से एहसास किया है। ऐसा व्यक्ति गुरु बन सकता है और दुनिया भर में वैष्णव दर्शन का प्रचार-प्रसार कर सकता है। वास्तविक प्रचारकों और गुरुओं का उदाहरण राजा प्रतीहा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)