यत्प्रीणनाद्बर्हिषि देवतिर्यङ्-मनुष्यवीरुत्तृणमाविरिञ्चात् ।
प्रीयेत सद्य: स ह विश्वजीव:प्रीत: स्वयं प्रीतिमगाद्गयस्य ॥ १३ ॥
अनुवाद
जब परमेश्वर किसी मनुष्य के कर्मों से प्रसन्न होते हैं, तब स्वतः ही सभी देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, मधुमक्खियाँ, लताएँ, वृक्ष, घास और भगवान ब्रह्मा से लेकर अन्य सभी जीव प्रसन्न हो जाते हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान सभी के परमात्मा हैं और वे स्वभाव से पूर्ण रूप से प्रसन्न रहते हैं। फिर भी, वे महाराजा गया के यज्ञ क्षेत्र में आए और कहा, "मैं पूरी तरह से प्रसन्न हूँ।"
When the Supreme Lord is pleased with the activities of a person, all the demigods, human beings, animals, birds, creepers, grasses and all other living entities automatically become pleased. The Supreme Personality of Godhead is the Supreme Personality of Godhead and He is by nature supremely pleased. Still He came to Maharaja Gaya's sacrificial ground and said, "I am perfectly pleased."
तात्पर्य
यहाँ यह स्पष्टतः कहा गया है कि केवल भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को संतुष्ट करके, व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के सभी देवताओं और अन्य सभी जीवित संस्थाओं को संतुष्ट करता है। यदि कोई पेड़ की जड़ पर पानी डालता है, तो सभी शाखाएँ, टहनियाँ, फूल और पत्ते पोषित होते हैं। हालाँकि सर्वोच्च भगवान आत्म-संतुष्ट हैं, लेकिन वह महाराजा गया के व्यवहार से इतने प्रसन्न थे कि वह व्यक्तिगत रूप से यज्ञ स्थल पर आए और कहा, "मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूँ।" महाराजा गया से कौन तुलना कर सकता है?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥