छन्दांस्यकामस्य च यस्य कामान्दुदूहुराजह्रुरथो बलिं नृपा: ।
प्रत्यञ्चिता युधि धर्मेण विप्रायदाशिषां षष्ठमंशं परेत्य ॥ ११ ॥
अनुवाद
यद्यपि महाराज गय में इन्द्रिय संतुष्टि के लिए व्यक्तिगत रूप से कोई इच्छा नहीं थी, किन्तु वैदिक अनुष्ठानों के पालन के कारण उनकी सभी इच्छाएँ पूर्ण होती रहती थीं। महाराज गय को जिन राजाओं से युद्ध करना पड़ता, वे धर्मयुद्ध के लिए विवश हो जाते थे। वे महाराज गय के युद्ध से बहुत सन्तुष्ट रहते और उन्हें सभी प्रकार की भेंटें दिया करते थे। इसी प्रकार उनके राज्य के सभी ब्राह्मण उनके उदार दानों से अत्यन्त सन्तुष्ट रहते थे। परिणामस्वरूप, ब्राह्मणों ने अगले जन्म में प्राप्त होने के लिए राजा गय को अपने पुण्यकर्मों का छठा भाग सहर्ष प्रदान किया था।
Although Maharaja Gaya had no personal desire for sense gratification, all his desires were fulfilled by performing Vedic rituals. The kings with whom Maharaja Gaya had to fight were forced to fight a war of Dharma. They were very satisfied with Maharaja Gaya's war and gave him all kinds of gifts. Similarly, all the Brahmins of his kingdom were very satisfied with his free donations. As a result, the Brahmins gladly gave King Gaya one-sixth of their good deeds to be received in the next birth.
तात्पर्य
एक क्षत्रिय या सम्राट के रूप में, महाराजा गया को कभी-कभी अपनी सरकार को बनाए रखने के लिए अधीनस्थ राजाओं के साथ युद्ध करना पड़ता था, लेकिन अधीनस्थ राजा उससे असंतुष्ट नहीं होते थे क्योंकि वे जानते थे कि वह धार्मिक सिद्धांतों के लिए लड़ता है। नतीजतन, उन्होंने अपनी अधीनता स्वीकार कर ली और उसे सभी प्रकार के उपहार बाँट दिए। इसी प्रकार, वैदिक अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मण भी राजा से इतने संतुष्ट थे कि वे अपने आगामी जनम में उसके लाभ के लिए अपनी एक छठवीं धार्मिक गतिविधियों हिस्सा देने के लिए तुरंत सहमत हो गए। इस प्रकार, ब्राह्मण और क्षत्रिय महाराजा गया के उचित प्रशासन के कारण उससे संतुष्ट थे। दूसरे शब्दों में, महाराजा गया ने लड़ाई लड़कर क्षत्रिय राजाओं को और दान करके ब्राह्मणों को संतुष्ट किया। वैश्यों को भी दयालु शब्दों और स्नेहपूर्ण व्यवहार से प्रोत्साहित किया जाता था, और महाराजा गया के लगातार बलिदानों के कारण, शूद्रों को शानदार भोजन और दान से संतुष्ट किया जाता था। इस तरह महाराजा गया ने सभी नागरिकों को बहुत संतुष्ट रखा। जब ब्राह्मणों और संतों का सम्मान किया जाता है, तो वे अपनी धार्मिक गतिविधियों को साझा करते हैं, उन्हें उन लोगों को दे देते हैं जो उनका सम्मान करते हैं और उनकी सेवा करते हैं। इसलिए, जैसा कि भगवद्-गीता (4.34) में कहा गया है, तद विद्धि प्रणिपातन परिप्रश्नन सेवया: व्यक्ति को एक आध्यात्मिक गुरु से विनम्रतापूर्वक संपर्क करने और उसकी सेवा करने का प्रयास करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥