श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  5.14.9 
क्‍वचिच्च वात्यौपम्यया प्रमदयाऽऽरोहमारोपितस्तत्कालरजसा रजनीभूत इवासाधुमर्यादो रजस्वलाक्षोऽपि दिग्देवता अतिरजस्वलमतिर्न विजानाति ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी, बवंडर की धूल से अंधे की तरह बंधी हुई आत्मा, विपरीत लिंग की सुंदरता को देखती है, जिसे प्रमादा कहा जाता है। इस तरह से अंधा होकर, वह एक महिला की गोद में बैठ जाता है, और उस समय उसकी अच्छी इंद्रियों पर जुनून का बल हावी हो जाता है। वह इस प्रकार वासना की इच्छा से लगभग अंधा हो जाता है और यौन जीवन को नियंत्रित करने वाले नियमों और विनियमों की अवहेलना करता है। वह नहीं जानता कि उसकी अवज्ञा विभिन्न देवताओं द्वारा देखी जा रही है, और वह भविष्य में मिलने वाली सजा को देखे बिना, आधी रात में अवैध यौन सुख का आनंद लेता है।
 
Sometimes this conditioned soul sees the beauty of a woman as if blinded by a storm of dust, which is called negligence. Thus blinded, he sits on the lap of a beautiful woman. At that time, his sensual desire overcomes his prudence. Thus, he becomes almost blinded by lust and starts violating all the rules of sexual life. He does not even know that many demigods are watching his violation. Thus, he enjoys illegal sexual pleasure in the midnight without thinking about the future punishment.
तात्पर्य
भगवद्गीता (7.11) में कहा गया है: धर्माविरुद्धो भूतेषु कामःस्मि भरतर्षभः। सेक्स केवल संतान प्राप्ति के लिए है, आनंद के लिए नहीं। परिवार, समाज और दुनिया के लाभ के लिए एक अच्छी संतान प्राप्ति के लिए सेक्स किया जा सकता है। अन्यथा, सेक्स धार्मिक जीवन के नियमों और विनियमों के खिलाफ है। एक भौतिकवादी व्यक्ति यह नहीं मानता कि प्रकृति में सब कुछ प्रबंधित है, और वह नहीं जानता कि यदि कोई व्यक्ति कुछ गलत करता है, तो अलग-अलग देवगण उसे देखते हैं। एक व्यक्ति अवैध सेक्स का आनंद लेता है, और अपनी अंधी, वासनायुक्त इच्छा के कारण, वह सोचता है कि कोई उसे देख नहीं सकता है, लेकिन यह अवैध सेक्स भगवान के व्यक्तित्व के एजेंटों द्वारा अच्छी तरह से देखा जाता है। इसलिए इस व्यक्ति को कई तरह से दंडित किया जाता है। वर्तमान में कलियुग में अवैध सेक्स के कारण कई गर्भधारण होते हैं, और कभी-कभी गर्भपात हो जाता है। इन पापपूर्ण गतिविधियों को भगवान के व्यक्तित्व के एजेंटों द्वारा देखा जाता है, और जो पुरुष और महिला ऐसी स्थिति पैदा करते हैं, उन्हें भौतिक प्रकृति के कड़े कानूनों (दवीय ह्यष गुम-मयी मम् माया दुर्त्यया) द्वारा भविष्य में दंडित किया जाता है। अवैध सेक्स को कभी माफ़ नहीं किया जाता है, और जो लोग इसमें लिप्त होते हैं, उन्हें जीवन-दर-जीवन दंडित किया जाता है। जैसा कि भगवद्गीता (16.20) में पुष्टि की गई है:

आसुरीं योनिमापन्ना

मूढ़ा जन्मनि जन्मनः

माम प्राप्यैव कौन्तेय

ततो यान्त्य अधमां गतिम्

"राक्षसी जीवन की प्रजातियों के बीच बार-बार जन्म लेते हुए, ऐसे व्यक्ति कभी भी मुझ तक नहीं पहुंच सकते हैं। धीरे-धीरे वे सबसे घृणित प्रकार के अस्तित्व में डूब जाते हैं।"

भगवान का व्यक्तित्व किसी को भी भौतिक प्रकृति के कड़े कानूनों के खिलाफ काम करने की अनुमति नहीं देता है; इसलिए अवैध यौन संबंध जीवन भर दंडित किए जाते हैं। अवैध सेक्स गर्भधारण करता है, और ये अवांछित गर्भधारण गर्भपात की ओर ले जाते हैं। इसमें शामिल लोग इन पापों में फंस जाते हैं, इतना अधिक कि अगले जीवन में भी उन्हें उसी तरह दंडित किया जाता है। इस प्रकार अगले जन्म में भी वे माँ के गर्भ में प्रवेश करते हैं और उसी तरह मारे जाते हैं। इन सभी चीजों को कृष्ण भावना की पारलौकिक स्थिति में बने रहने से टाला जा सकता है। इस तरह से कोई पापपूर्ण गतिविधि नहीं करता है। वासनापूर्ण इच्छा के कारण अवैध यौन संबंध सबसे प्रमुख पाप है। जब कोई व्यक्ति जुनून के तरीके से जुड़ता है, तो वह जीवन के बाद जीवन में दुख में फंस जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)