श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.14.6 
तत्र च क्‍वचिदातपोदकनिभान् विषयानुपधावति पानभोजनव्यवायादिव्यसनलोलुप: ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी गंधर्वपुरी में रहने वाला बद्धजीव खाता, पीता और स्त्री-प्रसंग में लिप्त होता है। इंद्रियसुखों के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण वह उसी तरह उनका पीछा करता है जैसे मरुस्थल में हिरण मरीचिका का पीछा करता है।
 
The conditioned soul sometimes eats, drinks and has sexual relations in this Gandharvapuri. Due to excessive attachment, he runs after sense-pleasures like a deer runs after a mirage in the desert.
तात्पर्य
इस संसार में दो प्रकार के लोक हैं - आध्यात्मिक और भौतिक. भौतिक संसार मृग मरीचिका के सादृश्य अवास्तविक है. रेगिस्तान में प्यासे जानवर पानी देखने की धारणा से भ्रमित होते हैं, जबकि वास्तव में वहाँ जल होता नहीं है। इसी प्रकार से पशु प्रकृति के लोग भौतिक जीवन के रेगिस्तान में शांति की खोज करते हैं। विभिन्न शास्त्रों में बार-बार यही कहा गया है कि इस भौतिक लोक में सुख संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त, भले ही हम सुख के बिना रहना स्वीकार कर लें, तब भी भौतिक प्रकृति हमें ऐसा करने की अनुमति नहीं देती। भगवद-गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि भौतिक संसार दुःखों से भरा हुआ है (दुःखालयम) और क्षणभंगुर भी है (अशाश्वतम्)। यहाँ दुःखों के बीच हम रहना चाहें भी, तो भौतिक प्रकृति हमें रहने नहीं देगी। वह हमें शरीर बदलने और दुखमय परिस्थितियों से भरे दूसरे वातावरण में प्रवेश करने के लिए बाध्य करेगी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)