श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  5.14.38 
एतस्मिन् संसाराध्वनि नानाक्लेशोपसर्गबाधित आपन्नविपन्नो यत्र यस्तमु ह वावेतरस्तत्र विसृज्य जातं जातमुपादाय शोचन्मुह्यन् बिभ्यद्विवदन् क्रदन् संहृष्यन्गायन्नह्यमान: साधुवर्जितो नैवावर्ततेऽद्यापि यत आरब्ध एष नरलोकसार्थो यमध्वन: पारमुपदिशन्ति ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
यह भौतिक जगत क्लेशमय है और इसमें जीवात्मा को अनेक संकटों का सामना करना पड़ता है। कभी वह सफल होता है, और कभी असफल। हर हाल में, यह मार्ग संकटों से भरा है। कभी-कभी मृत्यु या अन्य परिस्थितियों के कारण जीव अपने पिता से अलग हो जाता है। उसे छोड़कर वह धीरे-धीरे दूसरों से, जैसे अपने बच्चों से, जुड़ जाता है। इस तरह, वह कभी-कभी मोह में फंस जाता है और कभी भय से कांप उठता है। कभी वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता है, और कभी अपने परिवार का भरण-पोषण करते हुए ख़ुश होता है। कभी वह बहुत खुश होकर मधुर गीत गाता है। इस तरह वह भटकता रहता है और भूल जाता है कि उसका परमेश्वर से अनादिकाल से संबंध है। इस प्रकार, वह भौतिक अस्तित्व के ख़तरनाक रास्ते पर चलता है, और इस रास्ते पर उसे कोई सुख नहीं मिलता। जो लोग आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करते हैं, वे इस ख़तरनाक भौतिक अस्तित्व से मुक्त होने के लिए बस परमेश्वर की शरण लेते हैं। भक्ति के मार्ग के बिना कोई भी भौतिक अस्तित्व की जंजीरों से मुक्त नहीं हो सकता। निष्कर्ष यह है कि कोई भी भौतिक जीवन में खुश नहीं रह सकता। उसे कृष्ण-भावना का आश्रय लेना चाहिए।
 
The path of this material world is full of afflictions and the conditioned soul is troubled by many troubles. Sometimes he loses, sometimes he wins. In every case the path is full of obstacles. Sometimes the conditioned soul is separated from his father due to death or other reasons. He leaves him and gradually becomes attached to others, such as his children. Thus the conditioned soul is sometimes confused and sometimes wailing loudly out of fear. Sometimes he is happy while providing for his family, and sometimes he becomes overjoyed and sings melodious songs. Thus he becomes bound up in himself, forgetting the separation from the Supreme Lord for eternity. He has to walk on the dreadful path of the material world, but he is not at all happy on this path. The self-realized human beings take shelter of the Supreme Lord to escape from this dreadful path. No one can escape from the clutches of the material world without accepting the path of devotion. The meaning is that no one can be happy in this material life. One must take shelter of Krishna consciousness.
तात्पर्य
भौतिकवादी जीवनशैली का गहन विश्लेषण करने पर कोई भी समझदार व्यक्ति समझ सकता है कि इस दुनिया में जरा भी सुख नहीं है। परंतु अनादि काल से खतरनाक मार्ग पर चलने और साधु-संतों के साथ संगति न करने के कारण मोहित जीवात्मा, भ्रम में, इस भौतिक दुनिया में भोग करना चाहती है। कभी-कभी भौतिक ऊर्जा उसे तथाकथित सुख का मौका देती है, परंतु जीवात्मा को निरंतर भौतिक प्रकृति द्वारा दंड दिया जा रहा है। इसलिए कहा गया है कि डण्ड्य-जने राजा येन नदीते कुबाय। (चै .म. 20.118) भौतिक जीवन का अर्थ है निरंतर दुख, लेकिन कभी-कभी वह सुख को स्वीकार कर लेता है, जो अंतराल में प्रतीत होता है। कभी-कभी एक अभियुक्त व्यक्ति को पानी में डुबाया जाता है और ऊपर निकाला जाता है। वास्तव में यह सब दंड के लिए किया जाता है, लेकिन जब उसे पानी से बाहर निकाला जाता है तो उसे थोडा आराम महसूस होता है। जीवात्मा की भी स्थिति ऐसी ही है। इसलिए सभी शास्त्रों में सलाह दी जाती है कि साधु-भक्तों से जुड़ना चाहिए। "साधु-संग", "साधु-संग" - सर्व-शास्त्रे कहे

लव-मात्र साधु-संगे सर्व-सिद्धि हय। (चै .म. 22.54) भक्तों के साथ थोड़ी सी भी संगति से जीवात्मा इस दयनीय भौतिक स्थिति से बाहर निकल सकती है। इसलिए यह कृष्ण-भावनामृत आंदोलन सभी को साधु-संतों से संगति करने का मौका देने का प्रयास कर रहा है। इसलिए इस कृष्ण-भावनामृत मण्डली के सभी सदस्यों को स्वयं भी पूर्ण साधु होना चाहिए, ताकि गिरती हुई जीवात्माओं को सहारा दिया जा सके। यह श्रेष्ठ मानवोचित कार्य है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)