एवं वित्तव्यतिषङ्गविवृद्धवैरानुबन्धोऽपि पूर्ववासनया मिथ उद्वहत्यथापवहति ॥ ३७ ॥
अनुवाद
इच्छाओं की पूर्ति के लिए कभी-कभी परस्पर शत्रु लोग भी विवाह कर लेते हैं। किन्तु, ये विवाह अधिक समय तक नहीं टिक पाते और अंततः तलाक या अन्य कारणों से ये लोग फिर से अलग हो जाते हैं।
To fulfil their desires repeatedly, people sometimes enter into marital relations even if they are enemies of each other. Unfortunately, these marriages do not last long and such people get separated again due to divorce or other reasons.
तात्पर्य
जैसा कि पहले कहा गया है, प्रत्येक बद्ध जीव में धोखा देने की प्रवृत्ति होती है, विवाह में भी। इस भौतिक जगत में हर जगह, एक बद्ध जीव दूसरे से ईर्ष्या करता है। कुछ समय के लिए, लोग मित्र रह सकते हैं, लेकिन अंततः वे फिर से दुश्मन बन जाते हैं और पैसे के लिए लड़ते हैं। कभी-कभी वे विवाह कर लेते हैं और फिर तलाक या अन्य माध्यमों से अलग हो जाते हैं। कुल मिलाकर, एकता कभी स्थायी नहीं होती है। धोखे की प्रवृत्ति के कारण, दोनों पक्ष हमेशा ईर्ष्यालु बने रहते हैं। कृष्ण चेतना में भी, भौतिक प्रवृत्तियों की प्रमुखता के कारण अलगाव और शत्रुता होती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥