श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  5.14.35 
क्‍वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धनमुपयाति वित्तशाठ्येन ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी बद्ध जीव एक दूसरे के साथ लेन-देन या व्यापार करते हैं, लेकिन समय के साथ, धोखाधड़ी और ठगी के कारण, उनके बीच शत्रुता उत्पन्न हो जाती है। भले ही उस लेन-देन में बहुत कम लाभ हुआ हो, बद्ध जीव एक दूसरे के मित्र नहीं रहते और दुश्मन बन जाते हैं।
 
Sometimes conditioned souls reciprocate, but in the course of time enmity develops between them due to being cheated. Even if there is a small gain, conditioned souls cease to be friends and become enemies of one another.
तात्पर्य
श्रीमद्भावातम (५.५.८) में दिये गये अनुसार:-

पुम्सः स्त्रिया मिथुनीभावम एवं

तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः

अतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैः

जनस्य मोह आयमहं ममेति

वानर-समान बद्ध-आत्मा पहले काम संबंधों में अधिक आसक्त होता है और जब मुद्रा मैथुन निष्पादित होता है तब वह और भी अधिक आसक्त हो जाता है। उसके बाद वह कुछ भौतिक सुख सुविधायें पाना चाहता है- अपार्टमेंट, मकान, खाना, मित्र, धन इत्यादि। इन चीज़ों को प्राप्त करने के लिए उसे दूसरों से धोखा देना पड़ता है और यह धोखाधड़ी घनिष्ठ मित्रों में भी शत्रुता पैदा कर देती है। कभी-कभी यह शत्रुता बद्ध आत्मा और पिता या गुरु के मध्य पैदा हो जाती है। जब तक कोई व्यक्ति विधिवत् रूप से नियमनकारी सिद्धांतों में दृढ़ नहीं हो जाता, वह दुष्ट कार्य कर सकता है, चाहे कृष्ण चेतना आंदोलन का सदस्य ही क्यों न हो। इसलिये हम अपने शिष्यों को सलाह देते हैं कि वे अनुशासन संबंधी सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करें; अन्यथा मानवता के उत्थान के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन अपने सदस्यों के मध्य मतभेद के कारण बाधित हो जाएगा। जो लोग इस कृष्ण चेतना आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए गंभीर हैं, उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए और अनुशासन संबंधी सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करना चाहिए ताकि उनके मन में अशांति पैदा न हो।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)