पुम्सः स्त्रिया मिथुनीभावम एवं
तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः
अतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैः
जनस्य मोह आयमहं ममेति
वानर-समान बद्ध-आत्मा पहले काम संबंधों में अधिक आसक्त होता है और जब मुद्रा मैथुन निष्पादित होता है तब वह और भी अधिक आसक्त हो जाता है। उसके बाद वह कुछ भौतिक सुख सुविधायें पाना चाहता है- अपार्टमेंट, मकान, खाना, मित्र, धन इत्यादि। इन चीज़ों को प्राप्त करने के लिए उसे दूसरों से धोखा देना पड़ता है और यह धोखाधड़ी घनिष्ठ मित्रों में भी शत्रुता पैदा कर देती है। कभी-कभी यह शत्रुता बद्ध आत्मा और पिता या गुरु के मध्य पैदा हो जाती है। जब तक कोई व्यक्ति विधिवत् रूप से नियमनकारी सिद्धांतों में दृढ़ नहीं हो जाता, वह दुष्ट कार्य कर सकता है, चाहे कृष्ण चेतना आंदोलन का सदस्य ही क्यों न हो। इसलिये हम अपने शिष्यों को सलाह देते हैं कि वे अनुशासन संबंधी सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करें; अन्यथा मानवता के उत्थान के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन अपने सदस्यों के मध्य मतभेद के कारण बाधित हो जाएगा। जो लोग इस कृष्ण चेतना आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए गंभीर हैं, उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए और अनुशासन संबंधी सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करना चाहिए ताकि उनके मन में अशांति पैदा न हो।
