श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  5.14.28 
क्‍वापि देवमायया स्त्रिया भुजलतोपगूढ: प्रस्कन्नविवेकविज्ञानो यद्विहारगृहारम्भाकुलहृदयस्तदाश्रयावसक्तसुतदुहितृकलत्रभाषितावलोकविचेष्टितापहृतहृदय आत्मानमजितात्मापारेऽन्धे तमसि प्रहिणोति ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी, भौतिक संसार में फंसा हुआ जीव प्रमादवश स्त्री रूपी भ्रम के चंगुल में फंस जाता है। वह अपनी पत्नी या प्रेमिका के प्रति इतना आकर्षित हो जाता है कि उसे केवल स्त्री के आलिंगन की चाहत रह जाती है। इस प्रकार वह अपनी बुद्धि और जीवन के उद्देश्य का ज्ञान खो देता है। वह अब भौतिक सुखों को ही अपना लक्ष्य मान लेता है। वह अपनी पत्नी या प्रेमिका के लिए एक उपयुक्त घर, कार और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने में व्यस्त हो जाता है। इस चक्कर में वह अपने परिवार में ही कैद हो जाता है और अपनी पत्नी, बच्चों और रिश्तेदारों के इर्द-गिर्द घूमने लगता है। वह भगवान कृष्ण को भूल जाता है और भौतिक संसार के अंधेरे में डूब जाता है।
 
Sometimes, due to negligence, the conditioned soul becomes attracted to Maya personified (his wife or beloved) and becomes anxious to be embraced by her. Thus he loses his intelligence and knowledge of the purpose of life. At that time, instead of making efforts for spiritual practice, he becomes very attached to his wife or beloved and tries to provide a suitable house etc. for her. Then he becomes very busy with household affairs and gets entangled in the talks, glances and activities of his wife and children. Thus, deprived of Krsna consciousness, he falls into the deep darkness of material existence.
तात्पर्य
जब बद्ध आत्मा अपनी प्यारी पत्नी के आलिंगन में रहता है, वह कृष्ण चेतना के बारे में सब कुछ भूल जाता है। वह जितना अपनी पत्नी से जुड़ा होता है, वह पारिवारिक जीवन में उतना ही फँसता जाता है। एक बांग्ला कवि, बंकिम चंद्र कहते हैं कि प्रेमी की नज़र में उसकी प्रेमिका हमेशा बहुत सुंदर होती है, भले ही वह बदसूरत हो। इस आकर्षण को देव-माया कहा जाता है। स्त्री और पुरुष के बीच का आकर्षण दोनों के लिए ही बंधन का कारण बनता है। वास्तव में दोनों परा-प्रकृति, भगवान की श्रेष्ठ ऊर्जा के हैं, लेकिन दोनों ही वास्तव में प्रकृति (स्त्री) हैं। हालाँकि, क्योंकि दोनों एक-दूसरे का आनंद लेना चाहते हैं, उन्हें कभी-कभी पुरुष (नर) के रूप में वर्णित किया जाता है। वास्तव में न तो पुरुष है, लेकिन दोनों को सतही रूप से पुरुष के रूप में वर्णित किया जा सकता है। जैसे ही स्त्री और पुरुष मिलते हैं, वे घर, चूल्हा, भूमि, दोस्ती और धन से जुड़ जाते हैं। इस प्रकार वे दोनों भौतिक अस्तित्व में फंस जाते हैं। भूज-लता-उपगुढ़ शब्द, जिसका अर्थ है "सुंदर भुजाओं द्वारा आलिंगनबद्ध होना जो लताओं से तुलनीय हैं," उस तरीके का वर्णन करता है जिस तरह से बद्ध आत्मा इस भौतिक संसार में बंधी हुई है। निश्चित रूप से यौन जीवन के उत्पाद - पुत्र और पुत्रियाँ - अनुसरण करते हैं। यही भौतिक अस्तित्व का तरीका है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)