श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  5.14.23 
अथ च तस्मादुभयथापि हि कर्मास्मिन्नात्मन: संसारावपनमुदाहरन्ति ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए ज्ञानी एवं योगीजन भौतिक कृत्यों के पथ की निंदा करते हैं, क्योंकि यही इस जीवन में और अगले जीवन में सांसारिक दुखों का मूल स्रोत और प्रसारण का आधार है।
 
That is why learned persons and spiritualists denounce the materialistic path of action, because it is the root cause of worldly miseries in this life as well as in the next, and it is the basic ground for their growth.
तात्पर्य
जीवन का मूल्य न जानते हुए, कर्म करने वाले भी ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर लेते हैं जहां वह इस जीवन और अगले जीवन में भी कष्ट पाते हैं। दुर्भाग्य से, कर्म करने वाले लोग भौतिक इन्द्रिय सुखों से बहुत ही लगाव रखते हैं और वह न ही इस जीवन में, न ही अगले जीवन में भौतिक जीवन की दयनीय परिस्थितियों को समझ नहीं पाते। इस कारण से वेदों का उपदेश है कि लोग को आध्यात्मिक चेतना को जागृत करके अपनी समस्त क्रियाओं का उपयोग परमेश्वर कृपा प्राप्त करने के लिए करना चाहिए। स्वयं भगवान भगवद्गीता (9.27) में कहते हैं:

यत् करोषि यदश्नासि

यज्जुहोषि ददाशि यत्

यत तपस्यसि कौन्तेय

तत कुरुष्व मदर्पणम्

"हे कुन्तीपुत्र, तुम जो कुछ भी करते हो, जो भी खाते हो, जो कुछ तुम बलि अर्पित करते हो तथा दान करते हो, तुम्हारे द्वारा किये जाने वाले समस्त तप, उन्हीं को मुझे अर्पित करते हुए करो।"

सभी कार्यों के फल भोग-विलास के लिए नहीं, अपितु परमपुरुष के मिशन के लिए उपयोग किए जाने चाहिए। परम प्रभु सभी जानकारी भगवद्गीता में जीवन के लक्ष्य के बारे में देते हैं और अंत में भगवद्गीता की समाप्ति पर वह अपने चरणों में समर्पण की मांग करते हैं। आम तौर पर लोग इस मांग को पसंद नहीं करते, पर जो अनेक जन्मों से अध्यात्मिक ज्ञान की साधना करता है वह अंततः परमेश्वर के चरण कमलों की शरण ग्रहण करता है (बहुनाम जन्मनाम अन्ते ज्ञानवान माम प्रपद्यते)।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)