यत् करोषि यदश्नासि
यज्जुहोषि ददाशि यत्
यत तपस्यसि कौन्तेय
तत कुरुष्व मदर्पणम्
"हे कुन्तीपुत्र, तुम जो कुछ भी करते हो, जो भी खाते हो, जो कुछ तुम बलि अर्पित करते हो तथा दान करते हो, तुम्हारे द्वारा किये जाने वाले समस्त तप, उन्हीं को मुझे अर्पित करते हुए करो।"
सभी कार्यों के फल भोग-विलास के लिए नहीं, अपितु परमपुरुष के मिशन के लिए उपयोग किए जाने चाहिए। परम प्रभु सभी जानकारी भगवद्गीता में जीवन के लक्ष्य के बारे में देते हैं और अंत में भगवद्गीता की समाप्ति पर वह अपने चरणों में समर्पण की मांग करते हैं। आम तौर पर लोग इस मांग को पसंद नहीं करते, पर जो अनेक जन्मों से अध्यात्मिक ज्ञान की साधना करता है वह अंततः परमेश्वर के चरण कमलों की शरण ग्रहण करता है (बहुनाम जन्मनाम अन्ते ज्ञानवान माम प्रपद्यते)।
