संसार के जंगल में, बेकाबू इंद्रियाँ लुटेरों की तरह होती हैं। एक शर्तबद्ध आत्मा कृष्ण चेतना को आगे बढ़ाने के लिए कुछ पैसे कमा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से अनियंत्रित इंद्रियाँ उसके पैसे को कामुक सुखों के माध्यम से लूट लेती हैं। इंद्रियाँ लुटेरे हैं क्योंकि वे व्यक्ति को देखने, सूंघने, स्वाद लेने, छूने, सुनने, इच्छा करने और चाहने के लिए बेवजह ही अपना पैसा खर्च करने के लिए मजबूर करती हैं। इस प्रकार, शर्तबद्ध आत्मा अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने के लिए बाध्य होती है, और इस तरह उसका सारा पैसा खर्च हो जाता है। यह धन वास्तव में धार्मिक सिद्धांतों के निष्पादन के लिए अर्जित किया जाता है, लेकिन लुटेरी इंद्रियाँ इसे छीन लेती हैं।
In the jungle of material existence, the uncontrolled senses are like bandits. The conditioned soul may earn some wealth for the development of Krsna consciousness, but unfortunately the uncontrolled senses plunder this wealth by their gratification; the senses are bandits because they force the soul to waste his wealth on seeing, smelling, tasting, touching, hearing, thinking, choosing and desiring. Thus the conditioned soul is forced to gratify his senses, and thus all his wealth is spent. Although this wealth is actually earned for the performance of religious acts, the bandit-senses rob it.
तात्पर्य
पूर्व जन्म अर्जित विद्या पूर्व जन्म अर्जित धन अग्र धावति धावति। वर्णाश्रम धर्म के सिद्धांतों का पालन करके, व्यक्ति भौतिक दुनिया में एक बेहतर स्थान प्राप्त करता है। वह व्यक्ति अमीर, विद्वान, सुंदर या उच्च कुल का हो सकता है। जिसके पास ये सभी सम्पत्ति हो, उसे पता होना चाहिए कि वे सभी कृष्ण भावना की उन्नति के लिए है। दुर्भाग्य से, जब कोई व्यक्ति गुमराह हो जाता है तो वह अपने उच्च पद का दुरूपयोग इंद्रिय तृप्ति के लिए करता है। इसलिए अनियंत्रित इन्द्रियों को लूटेरा माना जाता है। वर्णाश्रम धर्म के नियमों के तहत धार्मिक सिद्धांतों को क्रियान्वित करके प्राप्त अच्छे पद को लूटने वाली इंद्रियाँ उसे बर्बाद कर देती है। वर्णाश्रम धर्म के नियमों के तहत धार्मिक सिद्धांतों को क्रियान्वित करके, व्यक्ति को एक आरामदायक स्थिति में रखा जाता है। वह व्यक्ति कृष्ण भावना की आगे की उन्नति के लिए आसानी से अपनी संपत्ति का उपयोग कर सकता है। यह समझना चाहिए कि भौतिक दुनिया में मिलने वाली संपत्ति और अवसर को इंद्रिय तृप्ति में बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए। वे कृष्ण भावना की उन्नति के लिए हैं। इसलिए यह कृष्ण भावना आंदोलन लोगों को एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा मन और पांच ज्ञान प्राप्त करने वाली इंद्रियों को नियंत्रित करने की शिक्षा दे रहा है। थोड़ी तपस्या करनी चाहिए और भक्ति सेवा के विनियमित जीवन के अलावा किसी और चीज पर पैसा खर्च नहीं करना चाहिए। इंद्रियों की मांग है कि सुंदर चीजें देखें; इसलिए मंदिर में देवता को सजाने के लिए पैसा खर्च करना चाहिए। इसी प्रकार, जीभ को अच्छा भोजन चखना होता है, जिसे खरीदा जाना चाहिए और देवता को भेंट किया जाना चाहिए। देवता को चढ़ाए फूलों को सूंघने में नाक का उपयोग किया जा सकता है, और श्रवण का उपयोग हरे कृष्ण मंत्र के कंपन को सुनने में किया जा सकता है। इस तरह इंद्रियों को नियंत्रित किया जा सकता है और कृष्ण भावना को आगे बढ़ाने के लिए उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार अनैतिक यौन संबंध, मांसाहार, नशा और जुए के रूप में भौतिक इंद्रिय संतुष्टि से एक अच्छी स्थिति खराब नहीं हो सकती। भौतिक दुनिया में एक संपन्न स्थिति कार चलाने, नाइट क्लब में समय बिताने या रेस्तरां में घृणित भोजन का स्वाद लेने से खराब हो जाती है। इस प्रकार, लूटने वाली इंद्रियां उन सभी संपत्तियों को छीन लेती हैं जिन्हें वातानुकूलित आत्मा ने बड़ी मुश्किल से हासिल किया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥