श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.14.18 
क्‍वचिद् गृहाश्रमकर्मचोदनातिभरगिरिमारुरुक्षमाणो लोकव्यसनकर्षितमना: कण्टकशर्कराक्षेत्रं प्रविशन्निव सीदति ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
गृहस्थाश्रम में बहुत सारे यज्ञ और अनुष्ठान करने होते हैं, जैसे कि पुत्र-पुत्रियों के लिए विवाह और यज्ञोपवीत संस्कार। ये सब गृहस्थ के कर्तव्य हैं। ये सारे कर्मकांड काफी व्यापक हैं और इन्हें करना बहुत मुश्किल है। इनकी तुलना एक बड़ी पहाड़ी से की जा सकती है, जिसे सांसारिक कामों में लगे रहने पर पार करना ही पड़ता है। जो व्यक्ति इन अनुष्ठानों से पार पाना चाहता है, उसे पहाड़ी चढ़ते समय काँटों और कंकड़ों के चुभने के समान कष्ट उठाने पड़ते हैं। इस तरह से बंधी हुई आत्मा को अनंत यातनाएँ सहनी पड़ती हैं।
 
In the Grihasthashram, various types of sacrifices and rituals have to be performed (especially marriage sacrifices and Yajnopaveet Sanskar for sons and daughters). All these are the duties of a householder. These are very extensive and difficult to perform. They are compared to a big mountain, which has to be crossed while engaging in worldly activities. The person who wants to conquer these rituals has to experience the pain caused by thorns and pebbles pricking the mountain. In this way, the conditioned soul has to endure endless tortures.
तात्पर्य
समाज में प्रतिष्ठित स्थिति बनाए रखने के लिए कई सामाजिक कार्य हैं। अलग-अलग देशों और समाजों में विभिन्न त्यौहार और रीति-रिवाज हैं। भारत में, पिता को अपने बच्चों की शादी करनी चाहिए। जब वह ऐसा करता है, तो परिवार के प्रति उसकी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है। शादियों की व्यवस्था करना बहुत कठिन है, खासकर इन दिनों। वर्तमान समय में कोई भी बलि का उचित अनुष्ठान नहीं कर सकता है, न ही कोई अपने बेटों और बेटियों के विवाह समारोह के लिए भुगतान कर सकता है। इसलिए जब इन सामाजिक कर्तव्यों का सामना करने पर गृहस्थ बहुत परेशान होते हैं। ऐसा लगता है जैसे उन्हें कांटों से चुभाया गया हो और कंकड़ों से चोट पहुंचाई गयी हो। भौतिक आसक्ति इतनी मजबूत है कि दुख के बावजूद, कोई इसे त्याग नहीं सकता। इसलिए प्रह्लाद महाराज अनुशंसा करते हैं (भाग. 7.5.5):

हित्वात्र्मा-पातां गृहम अंध-कूपं

वनं गतो यद् धरिम आश्रयेत

खेत में तथाकथित आरामदायक पारिवारिक स्थिति की तुलना एक अंधेरे कुएं से की जाती है। यदि कोई घास से ढंके एक अंधेरे कुएं में गिर जाता है, तो बचाव के लिए उसकी पुकार के बावजूद उसकी जान चली जाती है। इसलिए उच्च रूप से उन्नत आध्यात्मिक व्यक्ति सलाह देते हैं कि किसी को गृहस्थ-आश्रम में प्रवेश नहीं करना चाहिए। ब्रह्मचर्य-आश्रम में तपस्या के लिए खुद को तैयार करना और जीवन भर एक शुद्ध ब्रह्मचारी बने रहना बेहतर है जिससे कि गृहस्थ-आश्रम में सांसारिक जीवन के चुभने वाले कांटों को महसूस ना करना पड़े। गृहस्थ-आश्रम में व्यक्ति को मित्रों और रिश्तेदारों से निमंत्रण स्वीकार करने होते हैं और अनुष्ठानिक समारोह करने होते हैं। ऐसा करने से, व्यक्ति इन चीजों में बंध जाता है, हालांकि उसके पास इन्हें जारी रखने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हो सकते हैं। गृहस्थ जीवन शैली को बनाए रखने के लिए, व्यक्ति को धन अर्जित करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। इस प्रकार व्यक्ति सांसारिक जीवन में फंस जाता है, और वह कांटों के चुभने से पीड़ित होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)