क्वचित्कालविषमितराजकुलरक्षसापहृतप्रियतमधनासु: प्रमृतक इव विगतजीवलक्षण आस्ते ॥ १६ ॥
अनुवाद
सरकारी कर्मी हमेशा नरभक्षी राक्षसों की तरह होते हैं। ये सरकारी कर्मी कभी-कभी बद्ध जीव से नाराज़ हो जाते हैं और उसकी सारी जमा-पूँजी लूट लेते हैं। इस तरह अपनी जीवनभर की पूँजी खोकर वो जीव निराश हो जाता है। दरअसल, उसके लिए यह मौत जैसा ही होता है।
Government officials are always like cannibalistic demons. These government officials sometimes become angry with the conditioned soul and take away all his accumulated wealth. Thus, the conditioned soul becomes discouraged by losing the wealth accumulated over a lifetime. In fact, this is like death for him.
तात्पर्य
राजकुला रक्षसा यह शब्द बड़ा सार्थक है | श्रीमद्भागवत लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व लिखा गया है ,तथापि सरकारी आदमी राक्षसों का ही नाम लिए गये हैं। यदि सरकारी आदमी हमसे शत्रुता रखता है तो अपना जीवन भर के कमाए हुए धन से हमे वंचित कर देता है | साधारणतः आयकर देने में कोई रुचि नहीं रखता - स्वयं सरकारी आदमी भी इनकरो से बचने का प्रयत्न करते हैं - पर प्रतिकूल अवस्था में आयकर देने के लिए बल पूर्वक बाध्य कर दिये जाते हैं जिससे करदाता अत्यन्त अमर्ष करते हैं |
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥