राजोवाच
यो ह वा इह बहुविदा महाभागवत त्वयाभिहित: परोक्षेण वचसा जीवलोकभवाध्वा स ह्यार्यमनीषया कल्पितविषयो नाञ्जसाव्युत्पन्नलोकसमधिगम: । अथ तदेवैतद्दुरवगमं समवेतानुकल्पेन निर्दिश्यतामिति ॥ २६ ॥
अनुवाद
तब राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से कहा—हे स्वामी, हे परम भक्त साधु, आप सर्वज्ञाता हैं। आपने जंगल के बनिये के रूप में बद्ध जीव की स्थिति का अत्यंत मनोहर वर्णन किया है। इन उपदेशों से कोई भी बुद्धिमान मनुष्य समझ सकता है कि देहात्मबुद्धि वाले पुरुष की इंद्रियाँ उस जंगल में चोर-उचक्कों सी है और उसकी पत्नी और बच्चे सियार व अन्य हिंसक जंतुओं के समान हैं। किन्तु अल्पज्ञानी के लिए इस आख्यान को समझ पाना सरल नहीं है क्योंकि इस रूपक का सही-सही अर्थ निकाल पाना कठिन है। अत: मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि इसका अर्थ स्पष्ट करके बताएँ।
Then King Parikshit said to Sukadeva Goswami—O master, O most devout sage, you are omniscient. You have given a very beautiful description of the condition of the conditioned soul as a merchant in the forest. From these teachings any intelligent person can understand that the senses of a person who considers himself as a bodily being are like thieves and pickpockets in that forest and his wife and children are like jackals and other ferocious animals. But for those with limited knowledge it is not easy to understand this narration because it is difficult to find the correct meaning of this metaphor. Therefore I request you to explain its meaning.
तात्पर्य
भगवद्-भागवतम में कई कहानियाँ और घटनाएँ हैं जो रूपक के रूप में वर्णित की गई हैं। ऐसे अलंकारिक वर्णन बुद्धिहीन व्यक्ति नहीं समझ पाते हैं, इसलिए छात्र का कर्त्तव्य है कि वह प्रत्यक्ष व्याख्या के लिए किसी निष्ठावान गुरु के पास जाएँ।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत तेरहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥