शोच्यानिमांस्त्वमधिकष्टदीनान्
विष्ट्या निगृह्णन्निरनुग्रहोऽसि ।
जनस्य गोप्तास्मि विकत्थमानो
न शोभसे वृद्धसभासु धृष्ट: ॥ ७ ॥
अनुवाद
लेकिन ये सच है कि आपकी पालकी बिना पैसे लिए ले जाने वाले ये बेगुनाह लोग इस अत्याचार के कारण मुसीबत झेल रहे हैं। उनकी हालत बेहद दुखद है क्योंकि आपने उन्हें आपकी पालकी उठाने के लिए जबरदस्ती लगा रखा है। इससे साबित होता है कि आप क्रूर और निर्दयी हैं। इसके बावजूद आप अहंकार में चूर इस बात पर अड़े थे कि आप प्रजा के रक्षक हैं। ये कितनी हास्यास्पद बात है। आपके जैसा नादान आदमी ज्ञानियों की सभा में महान कैसे माना जा सकता है?
But it is true that these innocent people who carry your palanquin for forced labour are suffering because of this injustice. Their condition is very pitiable because you have forced them to carry your palanquin. This proves that you are cruel and heartless. Yet due to arrogance you were thinking that you are the protector of the people. This is ridiculous. Who can consider a fool like you a great man in the assembly of wise men?
तात्पर्य
राजा राहुगण को राजा होने पर गर्व था, और उसे लगता था कि नागरिकों को नियंत्रित करने का अधिकार उसे ही है, लेकिन असल में वह बिना भुगतान किए अपनी पालकी उठवाने के लिए लोगों को ज़बरदस्ती करवाता था, और इस तरह उन्हें बिना किसी कारण परेशान कर रहा था। इसके बावजूद, राजा यह सोचता था कि वह नागरिकों का संरक्षक है। असल में राजा को भगवान का प्रतिनिधि होना चाहिए। इसी कारण उसे नर-देवता, मनुष्यों में भगवान कहा जाता है। हालाँकि, जब एक राजा यह सोचता है कि वह राज्य का प्रमुख है इसलिए वह नागरिकों का इस्तेमाल अपनी संतुष्टि के लिए कर सकता है, तो वह गलत है। इस तरह का व्यवहार विद्वान लोग पसंद नहीं करते। वैदिक सिद्धांतों के अनुसार, राजा को विद्वान ऋषियों, ब्राह्मणों और विद्वानों द्वारा परामर्श दिया जाना चाहिए, जो धर्म-शास्त्र के आदेशों के अनुसार उसे सलाह देते हैं। राजा का कर्तव्य है कि वह इन निर्देशों का पालन करे। विद्वान मंडल राजा द्वारा अपने लाभ के लिए जनता के प्रयासों का उपयोग करने की सराहना नहीं करते। इसके बजाय उसका कर्तव्य है नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करना। राजा को इतना दुष्ट नहीं बनना चाहिए कि वह नागरिकों का शोषण अपने लाभ के लिए करे। श्रीमद-भागवतम में कहा गया है कि कलियुग में सरकार के प्रमुख लुटेरे और चोर होंगे। ये चोर और लुटेरे बलपूर्वक या षड्यंत्र के द्वारा जनता के धन और संपत्ति को लेते हैं। इसलिए श्रीमद-भागवतम में कहा गया है, राजन्यैर निर्रघृणैर् दस्यु-धर्मभिः। जैसे-जैसे कलियुग आगे बढ़ता है, हम देख सकते हैं कि ये विशेषताएँ पहले से ही दिखाई दे रही हैं। हम निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हैं कि कलियुग के अंत तक मानव सभ्यता कितनी बिगड़ जाएगी। वास्तव में, भगवान को और उनके साथ अपने संबंध को समझने में सक्षम कोई भी समझदार व्यक्ति नहीं होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो इंसान बिल्कुल जानवरों की तरह होंगे। उस समय, मानव समाज को सुधारने के लिए, भगवान कृष्ण कल्कि अवतार के रूप में आएंगे। उनका काम सभी नास्तिकों को मारना होगा क्योंकि अंततः असली रक्षक विष्णु, या कृष्ण हैं। भगवान अवतार लेते हैं और जब तथाकथित राजाओं और सरकार के प्रमुखों द्वारा चीजों का गलत प्रबंधन किया जाता है तो चीजों को व्यवस्थित करते हैं। जैसा कि कृष्ण भगवद् गीता में कहते हैं, यदा यदा हि धर्मस्या ग्लानिर्भवति भारत। बेशक इसमें कई साल लगते हैं, लेकिन सिद्धांत यही है। जब राजा या सरकारी प्रमुख उचित सिद्धांतों का पालन नहीं करता है, तो प्रकृति युद्ध, अकाल इत्यादि के रूप में सजा देती है | इसलिए यदि सरकारी प्रमुख जीवन के लक्ष्य से अवगत नहीं है, तो उसे लोगों पर शासन करने का जिम्मा नहीं लेना चाहिए। असल में प्रत्येक वस्तु का सर्वोपरि स्वामी भगवान विष्णु हैं। वह सभी के पालनहार हैं। राजा, पिता और संरक्षक केवल भगवान विष्णु के प्रतिनिधि हैं, जिन्हें प्रबंधन देखने और चीजों को बनाए रखने का अधिकार उन्हें भगवान ने दिया है। इसलिए राज्य के प्रमुख का कर्तव्य है कि वह सामान्य लोगों का इस तरह से पालन-पोषण करे कि लोग अंततः जीवन के लक्ष्य को जान सकें। न ते विदुः स्वार्थ-गतिं हि विष्णु। दुर्भाग्य से मूर्ख सरकारी प्रमुख और सामान्य लोग यह नहीं जानते कि जीवन का अंतिम लक्ष्य भगवान विष्णु को समझना और उनसे संपर्क करना है। इस ज्ञान के बिना, हर कोई अज्ञान में है, और समाज धोखेबाजों और धोखेबाजों से भरा हुआ है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥