श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 11: जड़ भरत द्वारा राजा रहूगण को शिक्षा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.11.2 
तथैव राजन्नुरुगार्हमेध-वितानविद्योरुविजृम्भितेषु ।
न वेदवादेषु हि तत्त्ववाद:प्रायेण शुद्धो नु चकास्ति साधु: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्, स्वामी और सेवक, राजा और प्रजा इत्यादि के संबंधों की बातें केवल भौतिक गतिविधियों की बातें हैं। वेदों में बताई गई भौतिक गतिविधियों में रुचि रखने वाले लोग यज्ञ करते हैं और भौतिक गतिविधियों पर ही श्रद्धा रखते हैं। ऐसे लोगों को आत्मिक उन्नति बिलकुल भी नहीं होती।
 
O King, the matters of master and servant, king and subjects etc. are material matters. People interested in the material matters propounded in the Vedas are bent upon performing yagyas and remaining devoted to material matters. Such people are never able to manifest the Self.
तात्पर्य
इस श्लोक में दो शब्द महत्वपूर्ण हैं- वेद-वाद और तत्त्व-वाद। भगवद-गीता के अनुसार, जो-जो व्यक्ति केवल वेदों में ही लगे रहते हैं और वेदों का उद्देश्य या वेदान्त-सूत्र तो समझते ही नहीं हैं, उन्हें वेद-वाद-रताः कहते हैं।

यम इमां पुष्पितां वाचम्

प्रवदन्त्यविपश्चितः

वेद-वाद-रताः पार्थ

नान्यदस्तीति वादिनः

कामात्मानः स्वर्ग-परा

जन्म-कर्म-फल-प्रदाम

क्रिया-विशेष-बहुलाम्

भोगैश्वर्य-गतिं प्रति

"अल्प ज्ञान वाले लोग वेद की सुंदर शब्दावली के फेर में फँसे रहते हैं, जो स्वर्ग-लोक तथा अच्छे जन्म, शक्ति और इस प्रकार की अन्य अनेक सुखद गति पाने के लिए अनेक प्रकार के कर्मकांडों का विधान करती है। इन्द्रिय-तृप्ति तथा ऐश्वर्यपूर्ण जीवन के इच्छुक ये लोग कहते हैं कि इसके अतिरिक्त कुछ और है ही नहीं।" (गीता 2.42-43)

वेद के वेद-वाद अनुयायी प्रायः कर्मकांड के प्रति प्रवृत्त रहते हैं, अर्थात् वेद की आज्ञानुसार यज्ञ किया करते हैं। इस प्रकार वे उच्चतर लोक-मंडलों में पदोन्नत किए जाते हैं। वे प्रायः चातुर्मास्य प्रणाली का अनुसरण करते रहते हैं। अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्य-याजिनः सुकृतं भवति: चातुर्मास्य-यज्ञ करनेवाला व्यक्ति पुण्यवान होता है। पुण्यवान बनने पर वह उच्चतर लोक-मंडलों में जा सकता है (ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्थाः)। वेद के कुछ अनुयायी स्थूल जीवन-स्तर में पदोन्नति पाने हेतु कर्मकांड में, वेद के कर्मकांडों में, लगे रहते हैं। दूसरे तर्क देते हैं कि यह वेद का उद्देश्य नहीं है। तद्यथा इह कर्म-जितो लोकः क्षीयते एवम एवं उत्र पुण्य-जितो लोकः क्षीयते। इस संसार में कोई कुलीन परिवार में जन्म लेकर, शिक्षित, सुंदर या बहुत धनी बनकर ऊँचे पद पर पहुँच सकता है। ये गत जीवन में किए पुण्यकर्मों के फल हैं। तथापि, पुण्यकर्मों के समाप्त होने पर ये सब भी समाप्त हो जाते हैं। यदि हम पुण्यकर्मों में लिप्त रहे तो अगले जन्म में हमें इस लोक में कई प्रकार की सांसारिक सुविधाएँ प्राप्त हो सकती हैं या हम स्वर्गलोक में भी जन्म ले सकते हैं। किन्तु ये सब अंततः समाप्त हो जाएँगे। क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति (गीता 9.21): जब पुण्यकर्मों का भण्डार समाप्त हो जाता है तो व्यक्ति को फिर इस मर्त्यलोक में आना पड़ता है। वेद की आज्ञानुसार पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करना ही वास्तव में वेद का उद्देश्य नहीं है। वेद का उद्देश्य भगवद्-गीता में बताया गया है। वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः: वेद का उद्देश्य है ईश्वर, कृष्ण को समझना। जो वेदवादी हैं वे वास्तव में ज्ञान में निपुण नहीं होते, और जो ज्ञानकांड (ब्रह्म-ज्ञान) के अनुयायी हैं, वे भी पूर्ण नहीं होते। किन्तु जब कोई व्यक्ति उपासना के स्तर पर आता है और ईश्वर की आराधना को स्वीकार करता है तो वह पूर्ण बन जाता है (आराधनानां सर्वेषां विष्णोरारादनं परम)। निःसंदेह वेद में विभिन्न देवताओं की आराधना और यज्ञ के अनुष्ठानों का वर्णन किया गया है, किन्तु ऐसी आराधना निम्नकोटि की है क्योंकि आराधक यह नहीं जानते कि अंतिम लक्ष्य विष्णु है (न ते विदुः स्वार्थ-गतिं हि विष्णुम्)। जब कोई व्यक्ति विष्णोरा-राधनम या भक्ति-योग के स्तर पर पहुँच जाता है तो उसे जीवन की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। अन्यथा जैसा कि भगवद्-गीता में निर्देश किया गया है, वह तत्त्ववादी नहीं होता बल्कि वेदवादी होता है, जो वेद की आज्ञानुसार अंधाधुंध अनुसरण करनेवाला होता है। वेदवादी तब तक भौतिक दूषणों से शुद्ध नहीं हो सकता जब तक वह तत्त्ववादी नहीं बन जाता, अर्थात् जो तत्त्व या परम सत्य को जानता है। तत्त्व का भी अनुभव तीन रूपों में होता है- ब्रह्मेति परमात्मैति भगवानिति शब्दयते। तत्त्व के ज्ञान के स्तर पर पहुँचने के पश्चात् भी व्यक्ति को भगवान की, विष्णु की और उनके विस्तारों की आराधना करनी चाहिए, अन्यथा वह अभी तक पूर्ण नहीं हुआ है। बाहूनां जन्मनमंते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते: अनेक जन्मों के पश्चात जो वास्तव में ज्ञानी होता है, वह भगवान कृष्ण के शरणागत होता है। निष्कर्ष यह है कि अल्पज्ञ बुद्धिहीन व्यक्ति भगवान, ब्रह्म या परमात्मा को समझ नहीं सकते, किन्तु वेदों का अध्ययन करने के पश्चात् और परम सत्य, परमेश्वर, के ज्ञान को प्राप्त करने के पश्चात ही व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान के स्तर पर पहुँचा हुआ माना जाना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)