श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 10: जड़ भरत तथा महाराज रहूगण की वार्ता  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.10.25 
न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्यसाम्येन वीताभिमतेस्तवापि ।
महद्विमानात् स्वकृताद्धि माद‍ृङ्नङ्‌क्ष्यत्यदूरादपि शूलपाणि: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरे प्रिय स्वामी, आप भगवान विष्णु के मित्र हैं, जो सभी जीवों के मित्र हैं। इसलिए, आप सभी के साथ समान हैं और शारीरिक अवधारणा से मुक्त हैं। यद्यपि मैंने आपका अपमान करके अपराध किया है, लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरे इस अपमान से आपको कोई हानि या लाभ नहीं होगा। आप दृढ़ संकल्प हैं, जबकि मैं अपराधी हूँ। इसलिए, भले ही मैं भगवान शिव जितना शक्तिशाली क्यों न होऊँ, वैष्णव के चरण-कमलों पर मेरे अपराध के कारण मैं तुरंत नष्ट हो जाऊँगा।
 
O Swami, you are the friend of the Supreme Personality of Godhead, the friend of all living entities. Therefore, you are equal to all and are completely free from the embodied consciousness. Although I have committed a crime by insulting you, I know that you will not be harmed or benefited by my disrespect. You are determined, whereas I am the offender. Therefore, even if I am as powerful as Lord Shiva, I will be immediately destroyed for committing an offense against the lotus feet of a Vaishnava.
तात्पर्य
महारज राहुगाना अत्यंत बुद्धिमान थे और वैष्णव का अपमान करने के अशुभ प्रभावों से सावधान रहते थे। इसलिए वे जड़ भरत द्वारा क्षमा दिए जाने के लिए बहुत उत्सुक थे। महाराज राहुगाना के पदचिह्नों पर चलते हुए, हर किसी को बहुत सावधानी रखनी चाहिए कि वह वैष्णव के चरण कमलों में कोई अपराध न करें। चैतन्य-भागवत (मध्य 13) में श्रील वृंदावन दास ठाकुर कहते हैं:

शूलपाणि-सम यदि भक्त-निंदा करे

भागवत प्रमाण - तथापि शीघ्र मरे

हेना वैष्णवेर निंदे सर्वज्ञ हा-इ

से जनैरा अधः-पाता सर्व-शास्त्रे का-इ

"यदि व्यक्ति भगवान शिव जैसा भी हो, जो अपने हाथों में त्रिशूल धारण करते है, भले ही वह भक्त की निंदा करने की कोशिश करे, फिर भी वह अपने अध्यात्मिक पद से पतन हो जाता है। यह सभी वैदिक धर्मग्रंथों का निष्कर्ष है।" वह चैतन्य-भागवत (मध्य 22) में भी कहते हैं:

वैष्णवेर निंदा करिबेका यारा गण

तारा रक्षा सामर्थ्य नाहीका कोण जन

शूलपाणि-सम यदि वैष्णवेर निंदे

तथापिहा नाश याया - कहै शास्त्र-वृंदे

इहाँ ना मानिया ये सुजन निंदा करे

जन्मे जन्मे से पापिष्ठ दैव-दोषे मरे

"जो वैष्णव की निंदा करता है उसे कोई भी बचा नहीं सकता। यदि कोई व्यक्ति भगवान शिव जितना भी शक्तिशाली हो, फिर भी अगर वह वैष्णव की निंदा करता है तो वह अवश्य ही नष्ट हो जाता है। यह सभी शास्त्रों का निष्कर्ष है। यदि कोई शास्त्रों के निर्णय की परवाह नहीं करता है और वैष्णव की निंदा करता है, तो वह इसके कारण जीवन के बाद के जन्मों में पीड़ित होता है।"

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत दसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)