श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 10: जड़ भरत तथा महाराज रहूगण की वार्ता  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  5.10.23 
शास्ताभिगोप्ता नृपति: प्रजानांय: किङ्करो वै न पिनष्टि पिष्टम् ।
स्वधर्ममाराधनमच्युतस्ययदीहमानो विजहात्यघौघम् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
महाशय, आप कह रहे हैं कि राजा और प्रजा या स्वामी और सेवक के बीच का रिश्ता हमेशा नहीं रहता है। भले ही ये रिश्ते अस्थायी हों, लेकिन अगर कोई व्यक्ति राजा बनता है, तो उसका कर्तव्य नागरिकों पर शासन करना और कानूनों का उल्लंघन करने वालों को दंडित करना है। उन्हें दंडित करके वो नागरिकों को राज्य के नियमों का पालन करना सिखाता है। आपने यह भी कहा है कि बधिर और गूंगे को दंडित करना ऐसा है जैसे चबाए हुए भोजन को दोबारा चबाना या पीसे हुए गन्ने को फिर से पीसना, जिससे कोई फायदा नहीं होता। लेकिन अगर कोई व्यक्ति ईश्वर द्वारा बताए गए अपने कर्तव्यों को निभाता है, तो उसके पापकर्म निश्चित रूप से कम हो जाते हैं। इसलिए, अगर किसी को उसके कर्तव्यों के पालन के लिए मजबूर भी किया जाए, तो भी उसे लाभ होता है, क्योंकि इससे उसके सारे पाप दूर हो सकते हैं।
 
Sir, you have said that the relations between king and subjects or master and servant are not eternal. Although such relations are temporary, yet when a person becomes a king, his duty is to rule over the citizens and punish those who disobey the laws. By punishing them he teaches the citizens to obey the laws of the state. Again, you have said that punishing the mute and the deaf is like chewing the chewed or grinding the ground pulp again, which means that there is no benefit in it. But if one keeps on performing his duties as instructed by the Supreme Lord, then his sins are definitely reduced. Therefore, if one is forcibly made to perform his duties, then he benefits, because in this way all his sins can be removed.
तात्पर्य
महाराज राहुगण द्वारा प्रस्तुत यह तर्क निश्चित रूप से अत्यंत प्रभावी है। उनके भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.2.4) में, श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं, तस्मात् केनापि उपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत्: किसी भी तरह से, किसी न किसी प्रकार से, व्यक्ति को कृष्ण चेतना में व्यस्त हो जाना चाहिए। वास्तव में, प्रत्येक जीव कृष्ण का एक शाश्वत सेवक है, लेकिन भूलवश, एक जीव माया का शाश्वत सेवक बन जाता है। जब तक कोई माया की सेवा में लगा रहता है, वह सुखी नहीं रह सकता। हमारी कृष्ण चेतना आंदोलन का उद्देश्य लोगों को भगवान कृष्ण की सेवा में संलग्न कराना है। इससे उन्हें सभी भौतिक संदूषण और पापपूर्ण गतिविधियों से मुक्त होने में मदद मिलेगी। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (4.10): वीत-राग-भय-क्रोधाह में की गई है। भौतिक गतिविधियों से अलग हो जाने से, हम भय और क्रोध से मुक्त हो जाएंगे। तपस्या द्वारा, व्यक्ति पवित्र हो जाता है और भगवान के पास वापस घर लौटने के योग्य हो जाता है। राजा का कर्तव्य अपने नागरिकों पर इस प्रकार शासन करना है कि वे कृष्ण चेतन बन सकें। यह सभी के लिए बहुत फायदेमंद होगा। दुर्भाग्य से, राजा या राष्ट्रपति लोगों को भगवान की सेवा के बजाय इंद्रिय तुष्टि में संलग्न करते हैं और ऐसी गतिविधियां निश्चित रूप से किसी के लिए भी फायदेमंद नहीं होती हैं। राजा राहुगण ने जड़ भरत को पालकी ढोने में संलग्न करने की कोशिश की, जो राजा के लिए इंद्रिय तुष्टि का एक रूप है। हालाँकि, यदि कोई व्यक्ति भगवान की सेवा में पालकी ढोने वाले के रूप में लगा हुआ है, तो यह निश्चित रूप से फायदेमंद है। इस अधर्मी सभ्यता में, यदि कोई राष्ट्रपति किसी भी तरह से लोगों को भक्ति सेवा या कृष्ण चेतना को जगाने में लगाता है, तो वह नागरिकों को सबसे अच्छी सेवा प्रदान करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)