योगिनामपि सर्वेषां
मद्-गतेनान्तरात्मना
श्रद्धावान् भजते यो माम्
स मे युक्ततमो मतः
"सभी योगियों में से, जो मुझे अटूट श्रद्धा से स्मरण करता है, और मेरी अनुपम प्रेमी सेवा में लगा रहता है, वही मुझसे योगमय होकर पूरी तरह से जुड़ा रहता है और सबसे ऊँचा माना जाता है।" (भगवद् गीता 6.47)
जड़ भरत एक सिद्ध योगी थे। वे पहले सम्राट भरत महाराज थे, और अब वे विद्वान ऋषियों में सर्वाधिक पूज्य और सभी अलौकिक शक्तियों के स्वामी थे। यद्यपि जड़ भरत एक सामान्य जीव थे, उन्होंने भगवान कपिलदेव द्वारा दिए गए सभी ज्ञान को अपने में समाहित कर लिया था। इसलिए उन्हें सीधे भगवान के रूप में स्वीकार किया जा सकता था। जैसा कि श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने अपने गुरु-वंदना छंदों में कहा है: साक्षाद-धर्मेण समस्त-शास्त्रैः। जड़ भरत जैसे संत भगवान के समान ही पूज्य हैं क्योंकि वे दूसरों को ज्ञान देकर ईश्वर का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैं। जड़ भरत को यहाँ भगवान के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार किया गया है क्योंकि वे परमेश्वर की ओर से ज्ञान प्रदान कर रहे थे। इसलिए महाराजा राहूगण ने निष्कर्ष निकाला कि उनसे आत्म-तत्त्व, अध्यात्म विज्ञान के बारे में पूछना उचित है। तद्-विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत। यह वैदिक आज्ञा यहाँ भी पुष्ट होती है। यदि कोई भी आत्म-विज्ञान (ब्रह्म जिज्ञासा) को जानने में रूचि रखता है, तो उसे जड़ भरत जैसे गुरु के पास जाना चाहिए।
