श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 10: जड़ भरत तथा महाराज रहूगण की वार्ता  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  5.10.19 
अहं च योगेश्वरमात्मतत्त्व-
विदां मुनीनां परमं गुरुं वै ।
प्रष्टुं प्रवृत्त: किमिहारणं तत्
साक्षाद्धरिं ज्ञानकलावतीर्णम् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
मैं आपको योग शक्ति के उच्चतम गुरु के रूप में मानता हूं। आप आध्यात्मिक विज्ञान को अच्छी तरह से जानते हैं। आप सभी विद्वान ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ हैं और आपने पूरे मानव समाज के लाभ के लिए अवतार लिया है। आप आध्यात्मिक ज्ञान देने आए हैं और ईश्वर के अवतार और ज्ञान के पूर्ण भाग, कपिलदेव के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि हैं। इसलिए मैं आपसे पूछ रहा हूं, हे गुरु, इस दुनिया में सबसे सुरक्षित आश्रय कौन सा है?
 
I consider you to be the revered master of the power of yoga. You are well acquainted with self-knowledge. You are the most revered among the sages and you have appeared for the welfare of the entire human society. You have come to impart self-knowledge and are the living representative of Kapildev, the incarnation of God and the essence of knowledge. Therefore, I am asking you, “O Guru, what is the safest refuge in this world?”
तात्पर्य
जैसे कि भगवद-गीता में कृष्ण बताते हैं:

योगिनामपि सर्वेषां

मद्-गतेनान्तरात्मना

श्रद्धावान् भजते यो माम्

स मे युक्ततमो मतः

"सभी योगियों में से, जो मुझे अटूट श्रद्धा से स्मरण करता है, और मेरी अनुपम प्रेमी सेवा में लगा रहता है, वही मुझसे योगमय होकर पूरी तरह से जुड़ा रहता है और सबसे ऊँचा माना जाता है।" (भगवद् गीता 6.47)

जड़ भरत एक सिद्ध योगी थे। वे पहले सम्राट भरत महाराज थे, और अब वे विद्वान ऋषियों में सर्वाधिक पूज्य और सभी अलौकिक शक्तियों के स्वामी थे। यद्यपि जड़ भरत एक सामान्य जीव थे, उन्होंने भगवान कपिलदेव द्वारा दिए गए सभी ज्ञान को अपने में समाहित कर लिया था। इसलिए उन्हें सीधे भगवान के रूप में स्वीकार किया जा सकता था। जैसा कि श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने अपने गुरु-वंदना छंदों में कहा है: साक्षाद-धर्मेण समस्त-शास्त्रैः। जड़ भरत जैसे संत भगवान के समान ही पूज्य हैं क्योंकि वे दूसरों को ज्ञान देकर ईश्वर का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैं। जड़ भरत को यहाँ भगवान के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार किया गया है क्योंकि वे परमेश्वर की ओर से ज्ञान प्रदान कर रहे थे। इसलिए महाराजा राहूगण ने निष्कर्ष निकाला कि उनसे आत्म-तत्त्व, अध्यात्म विज्ञान के बारे में पूछना उचित है। तद्-विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत। यह वैदिक आज्ञा यहाँ भी पुष्ट होती है। यदि कोई भी आत्म-विज्ञान (ब्रह्म जिज्ञासा) को जानने में रूचि रखता है, तो उसे जड़ भरत जैसे गुरु के पास जाना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)