तद्ब्रूह्यसङ्गो जडवन्निगूढ-
विज्ञानवीर्यो विचरस्यपार: ।
वचांसि योगग्रथितानि साधो
न न: क्षमन्ते मनसापि भेत्तुम् ॥ १८ ॥
अनुवाद
महाशय, आपका महान आध्यात्मिक ज्ञान छिपा हुआ प्रतीत होता है। वास्तव में, आप सभी भौतिक मोह से रहित हैं और परमात्मा के विचार में पूर्ण रूप से लीन हैं। इसलिए, आपका आध्यात्मिक ज्ञान अनंत है। कृपया बताएं कि आप मूर्ख की तरह इधर-उधर क्यों घूम रहे हैं? हे साधु, आपने योगानुसार शब्द कहे हैं, लेकिन हमारे लिए आपके कहने का अर्थ समझना संभव नहीं है। इसलिए, कृपया विस्तार से बताएं।
Sir, it appears that your great spiritual knowledge is hidden. You are devoid of all material attachments and are completely absorbed in the thought of God. Therefore your spiritual knowledge is infinite. Kindly explain why you are roaming everywhere like an inanimate object. O Sadhu, you have spoken the words in accordance with Yoga, but it is not possible for us to understand them. So kindly explain in detail.
तात्पर्य
जडा भरत जैसे संतलोग साधारण शब्द नहीं बोलते हैं। वे जो कुछ भी कहते हैं वह महान योगियों और आध्यात्मिक जीवन में उन्नत लोगों द्वारा स्वीकार किया जाता है। यही साधारण लोगों और संतों के बीच का अंतर है। श्रोता को भी जडा भरत जैसे महान, आध्यात्मिक रूप से उन्नत लोगों के शब्दों को समझने के लिए उन्नत होना चाहिए। भगवद्गीता अर्जुन से कही गई थी, दूसरों से नहीं। भगवान कृष्ण ने विशेष रूप से अर्जुन को आध्यात्मिक ज्ञान में निर्देश के लिए चुना था क्योंकि अर्जुन एक महान भक्त और विश्वासपात्र मित्र थे। इसी तरह, महान व्यक्तित्व भी उन्नत लोगों से बात करते हैं, न कि शूद्रों, वैश्यों, महिलाओं या मूर्ख पुरुषों से। कभी-कभी सामान्य लोगों को महान दार्शनिक निर्देश देना बहुत जोखिम भरा होता है, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु ने कलियुग की पतित आत्माओं के लाभ के लिए हमें एक बहुत अच्छा साधन दिया है, हरे कृष्ण मंत्र का जप। सामान्य लोग, हालाँकि शूद्र और कम हैं, इस हरे कृष्ण मंत्र का जप करने से शुद्ध हो सकते हैं। तब वे भगवद्गीता और श्रीमद-भागवतम के उच्च दार्शनिक वक्तव्यों को समझ सकते हैं। इसलिए हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन ने सामान्य जनता के लिए हरे कृष्ण महामंत्र के जप को अपनाया है। जब लोग धीरे-धीरे शुद्ध होते जाते हैं, तो उन्हें भगवद गीता और श्रीमद भागवतम के पाठों में निर्देश दिया जाता है। स्त्री, शूद्र और द्विज-बंधु जैसे भौतिकवादी लोग आध्यात्मिक उन्नति के शब्दों को नहीं समझ सकते हैं, फिर भी कोई वैष्णव की शरण ले सकता है, क्योंकि वह भगवद्गीता और श्रीमद भागवतम में बोली जाने वाली उच्च श्रेणी की विषय वस्तु में शूद्रों को भी ज्ञानवर्धन करने की कला जानता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥