महानुभाव, मुझे न तो इंद्र के वज्र से डर है, न ही नागदंश से, न ही भगवान शिव के त्रिशूल से। मुझे न तो मौत के अधीक्षक यमराज के दंड की कोई परवाह है, न ही मैं आग, चमकता सूरज, चंद्रमा, हवा या कुबेर के हथियारों से डरता हूँ। परन्तु, मैं ब्राह्मण के अपमान से डरता हूँ। मुझे इससे बहुत डर लगता है।
Noblemen, I am not afraid of Indra's thunderbolt, nor of the snake's sting, nor of Lord Shiva's trident. I am not concerned about the punishment of Yamraj, the superintendent of death, nor am I afraid of fire, the hot sun, the moon, the wind or Kubera's weapons. But I am afraid of the insult of a Brahmin. I am very afraid of this.
तात्पर्य
जब श्री चैतन्य महाप्रभु प्रयाग के दशश्वमेध घाट पर रूप गोस्वामी जी को उपदेश दे रहे थे, तो उन्होंने वैष्णव का अपराध करने की गंभीरता को स्पष्ट रूप से बताया। उन्होंने वैष्णव अपराध की तुलना एक मतवाले हाथी से की। जब एक मतवाला हाथी बगीचे में प्रवेश करता है, तो वह सभी फलों और फूलों को नष्ट कर देता है। इसी तरह, यदि कोई वैष्णव का अपराध करता है, तो वह अपनी सभी आध्यात्मिक संपत्तियों को नष्ट कर देता है। ब्राह्मण का अपराध करना बहुत खतरनाक है, और यह बात महाराज राहुगण जानते थे। इसलिए उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी गलती स्वीकार कर ली। कई खतरनाक चीजें हैं - वज्रपात, आग, यमराज का दंड, भगवान शिव के त्रिशूल का दंड आदि - लेकिन किसी को भी जाद भरत जैसे ब्राह्मण का अपराध करने के समान गंभीर नहीं माना जाता है। इसलिए महाराज राहुगण तुरंत अपने पालकी से उतरे और ब्राह्मण जाद भरत के चरणों में गिर गए ताकि उन्हें क्षमा कर दिया जाए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥