श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 10: जड़ भरत तथा महाराज रहूगण की वार्ता  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.10.15 
स चापि पाण्डवेय सिन्धुसौवीरपतिस्तत्त्वजिज्ञासायां सम्यक्‌श्रद्धयाधिकृताधिकारस्तद्‌धृदयग्रन्थिमोचनं द्विजवच आश्रुत्य बहुयोगग्रन्थसम्मतं त्वरयावरुह्य शिरसा पादमूलमुपसृत: क्षमापयन् विगतनृपदेवस्मय उवाच ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी आगे बोले—हे श्रेष्ठ पाण्डवों में श्रेष्ठ (महाराज परीक्षित), सिन्धु नदी और सौवीर नगर (नरेश रहूगण) के राजा को परम सत्य की चर्चाओं में श्रद्धा थी। इस प्रकार योग्य होने के कारण, उसने जड़ भरत से वह दार्शनिक उपदेश सुना जिसकी संस्तुति सभी योग साधना के ग्रन्थ करते हैं और जिससे हृदय में पड़ी गाँठ ढीली पड़ती है। इस प्रकार उसका राजा होने का गर्व नष्ट हो गया। वह तुरन्त पालकी से नीचे उतर आये और जड़ भरत के चरणों में अपना सिर रखकर पृथ्वी पर दण्डवत् गिर गये जिससे वह इस श्रेष्ठ ब्राह्मण को कहे गये अपमानजनक शब्दों के लिए क्षमा प्राप्त कर सके। फिर उन्होंने इस प्रकार प्रार्थना की।
 
Sukadeva Goswami continued—O best of the Pandu dynasty (Maharaja Pariksit), the king of Sindhu and Sauviras (Rahugana) had faith in the discussions of the Supreme Truth. Being thus qualified, he heard from Jad Bharata the philosophical teaching which is recommended by all the books on Yoga practice and which loosens the knot in the heart. Thus his pride of being a king was destroyed. He immediately got down from the palanquin and placing his head at the feet of Jad Bharata, fell down prostrating on the earth to obtain forgiveness for the insulting words spoken to this best of Brahmins. Then he prayed thus.
तात्पर्य
भगवद् गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं:

एवं परंपरा प्राप्तम

इमं राजर्षयो विदुः

स कालेनह महाता

योगो नष्ट परंतप

"इस उच्च विज्ञान को उत्तराधिकार की शृंखला के द्वारा प्राप्त किया गया और संत राजाओं ने इसे इसी तरह समझा। परंतु समय के साथ उत्तराधिकार टूट गया इसलिए यह विज्ञान जैसा कि है, खोया हुआ प्रतीत होता है।"

उत्तराधिकार के द्वारा राजपरिवार महान संतों के समान मंच पर था (राजा ऋषि)। पहले वे जीवन के दर्शन को समझ सकते थे और यह जानते थे कि नागरिकों को कैसे प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे उसी स्तर पर आ सकें। दूसरे शब्दों में, वे जानते थे कि नागरिकों को जन्म और मृत्यु के उलझाव से कैसे मुक्त किया जाए। जब महाराजा दशरथ ने अयोध्या पर राज्य किया, तो महान ऋषि विश्वामित्र एक बार राक्षस को मारने के लिए भगवान रामचंद्र और लक्ष्मण को जंगल ले जाने के लिए उनके पास आए। जब संत व्यक्ति विश्वामित्र महाराजा दशरथ के दरबार में आए, तो संत व्यक्ति का स्वागत करने के लिए राजा ने उनसे पूछा, ऐहष्टं यत् तत् पुनर्जनम जयाय। उन्होंने ऋषि से पूछा कि क्या जन्म और मृत्यु के दोहराव पर विजय प्राप्त करने के उनके प्रयास में सब कुछ ठीक चल रहा है। वैदिक सभ्यता की पूरी प्रक्रिया इसी बिंदु पर आधारित है। हमें पता होना चाहिए कि जन्म और मृत्यु के दोहराव पर कैसे विजय प्राप्त की जाए। महाराजा राहुगण भी जीवन के उद्देश्य को जानते थे, इसलिए जब जड़ भरत ने उनके समक्ष जीवन का दर्शन रखा, तो उन्होंने तुरंत उसकी सराहना की। यही वैदिक समाज की नींव है। विद्वान विद्वान, ब्राह्मण, संत व्यक्ति और ऋषि जो वैदिक उद्देश्य के बारे में पूरी तरह से जागरूक थे, ने राजपरिवार को सलाह दी कि सामान्य जनता को कैसे लाभ पहुंचाया जाए और उनके सहयोग से सामान्य जनता को लाभ हुआ। इसलिए सब कुछ सफल रहा। महाराजा राहुगण ने मानव जीवन के मूल्य को समझने की इस पूर्णता को प्राप्त किया, इसलिए उन्होंने जड़ भरत से अपने अपमानजनक शब्दों पर पछतावा किया और वह तुरंत अपनी पालकी से उतरे और जड़ भरत के चरण कमलों पर गिर गए ताकि उन्हें माफ किया जाए और उनसे और सुन सकें। जीवन के मूल्यों के बारे में जिन्हें ब्रह्म जिज्ञासा (परम सत्य की खोज) के रूप में जाना जाता है। वर्तमान समय में, उच्च सरकारी अधिकारी जीवन के मूल्यों से अनभिज्ञ हैं और जब संत व्यक्ति वैदिक ज्ञान का प्रसार करने का प्रयास करते हैं, तो तथाकथित कार्यकारी अपना सम्मानपूर्वक आज्ञा पालन नहीं करते बल्कि आध्यात्मिक प्रचार को बाधित करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार कोई कह सकता है कि पूर्व राजशाही स्वर्ग के समान थी और वर्तमान सरकार नरक के समान है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)