उन्मत्तमत्तजडवत्स्वसंस्थां
गतस्य मे वीर चिकित्सितेन ।
अर्थ: कियान् भवता शिक्षितेन
स्तब्धप्रमत्तस्य च पिष्टपेष: ॥ १३ ॥
अनुवाद
हे राजन्, आपने कहा “रे दुष्ट, जड़ तथा पागल! मैं तुम्हारी चिकित्सा करने जा रहा हूँ और तब तुम होश में आ जाओगे।” इस सम्बन्ध में मुझे कहना है कि यद्यपि मैं जड़, गूँगे तथा बहरे मनुष्य की भाँति रहता हूँ, किन्तु मैं सचमुच एक स्वरूप-सिद्ध व्यक्ति हूँ। आप मुझे दण्डित करके क्या पाएँगे? यदि आपका अनुमान ठीक है और मैं पागल हूँ तो आपका यह दंड एक मरे हुए घोड़े को पीटने जैसा होगा। उससे कोई लाभ नहीं होगा। जब पागल को दंडित किया जाता है, तो उसका पागलपन ठीक नहीं होता है।
O King, you said, "You wicked, stupid and insane person! I am going to treat you and then you will come to your senses." In this regard I have to say that although I live like an inanimate, dumb and deaf person, I am really a self-realized person. What will you gain by punishing me? If your guess is correct and I am insane, then your punishment will be like beating a dead horse. It will be of no use. When a mad person is punished, his madness is not cured.
तात्पर्य
इस भौतिकवादी दुनिया में हर कोई भौतिक स्थिति में गलत तरीके से प्राप्त कुछ धारणाओं के तहत एक दीवाने की तरह काम कर रहा है। उदाहरण के लिए, एक चोर जो जानता है कि चोरी करना अच्छा नहीं है और कौन जानता है कि राजा या भगवान द्वारा उसे सज़ा दी जाती है, जिसने देखा है कि चोरों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जाता है और सज़ा दी जाती है, फिर भी बार-बार चोरी करता है। वह इस विचार से ग्रस्त है कि चोरी करने से वह खुश होगा। यह पागलपन का संकेत है। बार-बार सज़ा के बाद भी, चोर अपनी चोरी की आदत को नहीं छोड़ सकता; इसलिए सज़ा बेकार है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥