(माया) माया के वश में, यहाँ भूमिका में,
खाते हुए डूबते हैं, भाई
(जीव) कृष्ण-दास, इस विश्वास के साथ,
कर लो तो दुख नहीं रहेगा
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं कि सभी पुरुष और स्त्रियाँ भौतिक प्रकृति की लहरों पर भूसे की तरह तैर रहे हैं। यदि वे यह समझ लेते हैं कि वे कृष्ण के शाश्वत सेवक हैं, तो वे इस अस्थायी स्थिति का अंत कर देंगे। जैसा कि भगवद-गीता (3.37) में कहा गया है: काम एष क्रोध एष रजो-गुण-समुद्भवः। राजस गुण के कारण, हम कई चीजों की इच्छा करते हैं, और हमारी इच्छा या चिंता के अनुसार और परम प्रभु के आदेश के अनुसार, भौतिक प्रकृति हमें एक निश्चित प्रकार का शरीर देती है। कुछ समय के लिए हम स्वामी या सेवक के रूप में खेलते हैं, जैसे अभिनेता किसी और के निर्देशन में मंच पर खेलते हैं। जब हम मानव रूप में होते हैं, तो हमें इस निरर्थक मंच प्रदर्शन को समाप्त कर देना चाहिए। हमें अपनी मूल सांवैधानिक स्थिति में आना चाहिए, जिसे कृष्ण चेतना के रूप में जाना जाता है। इस समय, वास्तविक स्वामी भौतिक प्रकृति है। दैवी ह्येषा गुण-मयी मम माया दुरत्यया (भगवद्गीता 7.14)। भौतिक प्रकृति के प्रभाव में, हम नौकर और मालिक बन रहे हैं, लेकिन अगर हम भगवान और उनके शाश्वत सेवकों द्वारा नियंत्रित होने के लिए सहमत होते हैं, तो यह अस्थायी स्थिति समाप्त हो जाती है।
