श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  5.1.39 
तस्य ह वा एते श्लोका:—
प्रियव्रतकृतं कर्म को नु कुर्याद्विनेश्वरम् ।
यो नेमिनिम्नैरकरोच्छायां घ्नन् सप्त वारिधीन् ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
महाराज प्रियव्रत ने जो किया वो भगवान् के अलावा कोई नहीं कर सकता। उन्होंने अपने रथ के पहियों की नोंक से सात समुद्र बनाए और रात के अँधेरे को मिटा दिया।
 
Many verses related to the deeds of Maharaj Priyavrata are famous - "Whatever Maharaj Priyavrata did, no one else could have done except God. He dispelled the darkness of the night and created seven seas with the rims of the wheels of his chariot."
तात्पर्य
"भगवद व्यक्तित्व के अतिरिक्त कोई और नहीं है। जो महाराज प्रियव्रत ने कार्य किया है। महाराज प्रियव्रत ने रात का अंधकार हटा दिया और अपने महान रथ के पाटुओं के साथ उन्होंने सातों महासागरों का निर्माण किया।"

महाराज प्रियव्रत की गतिविधियों के संबंध में, कई उत्कृष्ट छंद हैं जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। वह इतने प्रसिद्ध हैं कि उनकी गतिविधियों की तुलना भगवान के व्यक्तित्व के साथ की जाती है। कभी-कभी भगवान के एक निष्ठावान सेवक और भक्त को भगवान भी कहा जाता है। श्री नारद को भगवान कहा जाता है, और भगवान शिव और व्यासदेव को भी někdy भगवान कहा जाता है। यह पदवी, भगवान, कभी-कभी प्रभु की कृपा से एक शुद्ध भक्त को प्रदान की जाती है ताकि वह बहुत अधिक सम्मानित हो। महाराज प्रियव्रत ऐसे ही एक भक्त थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)