भगवान की कृपा से, महाराज प्रियव्रत के इंद्रियाँ पुन: जाग्रत हो गईं। उन्होंने अपनी सारी सांसारिक संपत्ति अपने आज्ञाकारी पुत्रों के बीच बाँट दी। उन्होंने अपनी पत्नी सहित जिसके साथ उन्होंने इन्द्रियसुख भोगा था और अपने विशाल और आलीशान राज्य का त्याग कर दिया और सभी प्रकार के मोह से रहित हो गए। शुद्ध होने के बाद, उनका हृदय भगवान के लीलाओं का स्थान बन गया। इस प्रकार वे कृष्णभावना के पथ पर लौट आये और महामुनि नारद के अनुग्रह से उन्हें वह पद फिर से प्राप्त हो गया जो उन्होंने पहले प्राप्त किया था।
By the grace of the Lord, Maharaja Priyavrata regained his discernment. He distributed all his wealth among his obedient sons. He renounced everything, including his wife with whom he had enjoyed sensual pleasures and his vast opulent kingdom, and became devoid of all attachment. His heart, purified, became the seat of the Lord's pastimes. Thus he returned to the path of Krishna consciousness and resumed the position he had attained by the grace of the great sage Narada.
तात्पर्य
जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिक्शाष्टक में कहा है, चेतः-दर्पण-मार्जनं भाव-महा-दावाग्नि-निर्वापणम्: जैसे ही किसी का हृदय साफ हो जाता है, भौतिक अस्तित्व की धधकती आग तुरंत बुझ जाती है। हमारे दिल ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के मनोरंजनों के लिए हैं। इसका मतलब यह है कि व्यक्ति को पूरी तरह से कृष्ण चेतन होना चाहिए, कृष्ण के बारे में सोचना चाहिए, जैसा कि वह स्वयं सलाह देते हैं (मन-मना भाव मद्-भक्तो मद्-याजी माँ नमस्करु)। यही हमारा एकमात्र व्यवसाय होना चाहिए। जिसका हृदय शुद्ध नहीं होता, वह सर्वोच्च प्रभु के दिव्य मनोरंजनों के बारे में नहीं सोच सकता, लेकिन अगर वह एक बार फिर अपने हृदय में सर्वोच्च व्यक्तित्व ईश्वर को स्थापित कर सकता है, तो वह बहुत आसानी से भौतिक मोह को त्यागने के योग्य हो जाता है। मायावादी दार्शनिक, योगी और ज्ञानी केवल यह कहकर इस भौतिक दुनिया को छोड़ने की कोशिश करते हैं कि ब्रह्म सत्यं जगन मिथ्या: "यह दुनिया झूठी है। इसका कोई उपयोग नहीं है। आइए ब्रह्म की शरण लें।" ऐसा सैद्धांतिक ज्ञान हमारी मदद नहीं करेगा। अगर हम मानते हैं कि ब्रह्म वास्तविक सत्य है, तो हमें अपने दिलों में भगवान कृष्ण के चरण कमल रखने होंगे, जैसा कि महाराज अंबरीष ने किया था (स वै मनः कृष्ण-पदारविंदयोः)। व्यक्ति को अपने हृदय में भगवान के चरण कमल स्थापित करने होते हैं। फिर उसे भौतिक उलझावों से मुक्त होने की शक्ति मिलती है। महाराज प्रियव्रत अपने भव्य राज्य को छोड़ने में सफल रहे, और उन्होंने अपनी खूबसूरत पत्नी के साथ भी साथ छोड़ दिया जैसे वह एक मृत शरीर होती। व्यक्ति की पत्नी कितनी ही सुंदर क्यों न हो और उसकी शारीरिक विशेषताएं कितनी ही आकर्षक क्यों न हों, उसके शरीर के मरने पर वह उसमें कोई दिलचस्पी नहीं लेता। हम एक सुंदर महिला की उसके शरीर के लिए प्रशंसा करते हैं, लेकिन वही शरीर, जब आत्मा से रहित होता है, तो अब किसी भी कामुक व्यक्ति के लिए दिलचस्प नहीं रहता। महाराज प्रियव्रत इतने मजबूत थे, भगवान की कृपा से, कि भले ही उनकी खूबसूरत पत्नी जीवित थी, वह उसका साथ छोड़ सकते थे ठीक वैसे ही जैसे किसी को मृत पत्नी का साथ छोड़ने पर मजबूर किया जाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा: न धनं न जनं न सुंदरीं कवितां वा जगदीश कामये मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद भक्तिर अहैतुकी त्वयी "हे सर्वशक्तिमान भगवान, मुझे धन जमा करने की कोई इच्छा नहीं है, न ही मुझे सुंदर स्त्रियों की इच्छा है, न ही मुझे किसी भी अनुयायी की चाहत है। मुझे सिर्फ जन्मों-जन्मों तक आपकी निःस्वार्थ भक्ति चाहिए।" जो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ना चाहता है, उसके लिए भौतिक वैभव से मोह और एक सुंदर पत्नी से मोह दो बड़ी बाधाएँ हैं। ऐसे आसक्तियों की आत्महत्या से भी ज्यादा निंदा की जाती है। इसलिए जो कोई भी भौतिक अज्ञान के पार जाना चाहता है, उसे, कृष्ण की कृपा से, स्त्री और धन से मोह से मुक्त होना होगा। जब महाराज प्रियव्रत इन आसक्तियों से पूरी तरह मुक्त हो गए तो वह फिर से शांतिपूर्ण तरीके से महान ऋषि नारद द्वारा निर्देशित सिद्धांतों का पालन कर सके।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥