नेहाभिक्रम-नाशोऽस्ति
प्रत्यवायो न विद्यते
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य
त्रायते महतो भयात्
"भक्ति सेवा में कोई हानि या हस्र नहीं है, और भक्ति जीवन में प्रदान की जाने वाली एक छोटी सी सेवा भी किसी को सबसे बड़े खतरे से बचाने के लिए पर्याप्त है।" (भगवद गीता २.४०) महाराज पृथुव्रत के समान ऐसा त्याग केवल भगवान के कृपा से ही संभव है। आम तौर पर जब लोग शक्तिशाली होते हैं या जब उनकी एक सुंदर पत्नी, एक सुंदर घर और भौतिक लोकप्रियता होती है, तो वह अधिक से अधिक उलझ जाते हैं। हालाँकि, महाराज पृथुव्रत, महान ऋषि नारद द्वारा पूरी तरह से प्रशिक्षित किए जाने के कारण, सभी बाधाओं के बावजूद अपनी कृष्णभावनाभावित को पुनर्जीवित कर दिया।
