श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  5.1.37 
अहो असाध्वनुष्ठितं यदभिनिवेशितोऽहमिन्द्रियैरविद्यारचितविषमविषयान्धकूपे तदलमलममुष्या वनिताया विनोदमृगं मां धिग्धिगिति गर्हयाञ्चकार ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
राजा ने आत्मग्लानि से भरकर कहा, "अरे! मैं इंद्रिय-सुख के कारण कितना लांछित हो गया हूँ। मैं तो भौतिक सुखों के अंधे कुएं में गिर गया हूँ। अब बहुत हुआ! मुझे अब और भोग नहीं चाहिए। देखो तो, मैं कैसे अपनी पत्नी के हाथों का नाचता हुआ बंदर बन गया हूँ। इसलिए मुझे धिक्कार है।"
 
The king lamented himself thus—Oh! How reproachable I have become because of sensual pleasures. I have now fallen into the dark well of material pleasures. Enough! Now I do not want any more pleasures. Just look at me—how I have become a dancing monkey in the hands of my wife. That is why I am reproached.
तात्पर्य
महाराज पृथुव्रत के व्यवहार से समझ सकते हैं कि भौतिक ज्ञान का उन्नयन किस प्रकार निंदनीय है। उन्होंने रात में चमकने वाले एक और सूर्य के निर्माण और एक इतना बड़ा रथ बनाने जैसे अद्भुत कार्य किये, जिसके पहियों ने विशाल समुद्रों का निर्माण किया। ये गतिविधियाँ इतनी महान हैं कि आधुनिक वैज्ञानिक सोच भी नहीं सकते कि ऐसी चीजें कैसे हो सकती हैं। महाराज पृथुव्रत ने भौतिक गतिविधियों के क्षेत्र में बहुत ही आश्चर्यजनक कार्य किये, लेकिन क्योंकि वह इन्द्रिय तृप्ति में लिप्त थे - अपने राज्य पर शासन करना और अपनी सुंदर पत्नी के इशारों पर नाचना - उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अपनी निंदा की। जब हम महाराज पृथुव्रत के इस उदाहरण के बारे में सोचते हैं, तो हम केवल विचार कर सकते हैं कि भौतिकवादी उन्नति की आधुनिक सभ्यता कितनी गिरी हुई है। आधुनिक तथाकथित वैज्ञानिक और अन्य भौतिकवादी बहुत संतुष्ट हैं क्योंकि वे महान पुलों, सड़कों और मशीनों का निर्माण कर सकते हैं, लेकिन ऐसी गतिविधियाँ महाराज पृथुव्रत की गतिविधियों की तुलना में कुछ भी नहीं हैं। यदि महाराज पृथुव्रत अपनी अद्भुत गतिविधियों के बावजूद खुद की निंदा कर सकते हैं, तो हम अपनी भौतिक सभ्यता की तथाकथित उन्नति में कितने निंदनीय हैं। हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि इस भौतिक संसार में उलझे जीव की समस्याओं से ऐसी उन्नति का कोई लेना-देना नहीं है। दुर्भाग्य से, आधुनिक मनुष्य अपनी उलझन और वह कितना निंदनीय है, यह नहीं समझता है, और न ही वह जानता है कि अगले जीवन में उसे किस प्रकार का शरीर प्राप्त होने वाला है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, एक महान साम्राज्य, सुंदर पत्नी और अद्भुत भौतिक गतिविधियाँ आध्यात्मिक उन्नति के लिए सभी बाधाएँ हैं। महाराज पृथुव्रत ने महान ऋषि नारद की ईमानदारी से सेवा की थी। इसलिए, भले ही उन्होंने भौतिक संपदाओं को स्वीकार कर लिया था, लेकिन वह अपने स्वयं के कार्य से विचलित नहीं हो सके। वह फिर से कृष्णभावनाभावित हो गए। जैसा कि भगवद-गीता में पुष्टि की गई है:

नेहाभिक्रम-नाशोऽस्ति

प्रत्यवायो न विद्यते

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य

त्रायते महतो भयात्

"भक्ति सेवा में कोई हानि या हस्र नहीं है, और भक्ति जीवन में प्रदान की जाने वाली एक छोटी सी सेवा भी किसी को सबसे बड़े खतरे से बचाने के लिए पर्याप्त है।" (भगवद गीता २.४०) महाराज पृथुव्रत के समान ऐसा त्याग केवल भगवान के कृपा से ही संभव है। आम तौर पर जब लोग शक्तिशाली होते हैं या जब उनकी एक सुंदर पत्नी, एक सुंदर घर और भौतिक लोकप्रियता होती है, तो वह अधिक से अधिक उलझ जाते हैं। हालाँकि, महाराज पृथुव्रत, महान ऋषि नारद द्वारा पूरी तरह से प्रशिक्षित किए जाने के कारण, सभी बाधाओं के बावजूद अपनी कृष्णभावनाभावित को पुनर्जीवित कर दिया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)