श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.1.31 
ये वा उ ह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखातास्ते सप्त सिन्धव आसन् यत एव कृता: सप्त भुवो द्वीपा: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
जब प्रियव्रत ने अपने रथ को सूर्य के पीछे दौड़ाया, तो उनके रथ के पहियों के निशानों ने जो छाप छोड़ी वे ही बाद में सात समुद्र बन गए और भूमण्डल सात द्वीपों में बँट गया।
 
When Priyavrata drove his chariot behind the Sun, the marks left by the wheels of his chariot later became seven seas and the earth got divided into seven islands.
तात्पर्य
कभी-कभी आकाश के ग्रहों को द्वीप कहा जाता है। हमें महासागर में विभिन्न प्रकार के द्वीपों का अनुभव होता है और इसी प्रकार, विभिन्न ग्रहों को चौदह लोकों में विभाजित किया गया है जो कि अंतरिक्ष के महासागर में द्वीप हैं। जैसे-जैसे प्रियव्रत ने अपने रथ को सूर्य के पीछे चलाया, उन्होंने सात अलग-अलग प्रकार के महासागरों और ग्रह प्रणालियों का निर्माण किया, जिन्हें पृथ्वी-मंडल या भूलोक के रूप में जाना जाता है। गायत्री मंत्र में, हम जप करते हैं, ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्। भूलोक ग्रह प्रणाली के ऊपर भुवर्लोक है, और उसके ऊपर स्वर्गलोक है, स्वर्गीय ग्रह प्रणाली है। इन सभी ग्रह प्रणालियों को सवित्री, सूर्य-देव द्वारा नियंत्रित किया जाता है। सुबह जल्दी उठने के बाद गायत्री मंत्र का जाप करके, व्यक्ति सूर्य-देव की पूजा करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)