यावदवभासयति सुरगिरिमनुपरिक्रामन् भगवानादित्यो वसुधातलमर्धेनैव प्रतपत्यर्धेनावच्छादयति तदा हि भगवदुपासनोपचितातिपुरुषप्रभावस्तदनभिनन्दन् समजवेन रथेन ज्योतिर्मयेन रजनीमपि दिनं करिष्यामीति सप्तकृत्वस्तरणिमनुपर्यक्रामद् द्वितीय इव पतङ्ग: ॥ ३० ॥
अनुवाद
इस प्रकार राज्य का उत्तम प्रकार से संचालन करते हुए राजा प्रियव्रत एक बार महाबलशाली सूर्यदेव की परिक्रमा से असंतुष्ट हो गए। सूर्यदेव अपने रथ पर बैठकर सुमेरु पर्वत की परिक्रमा करते हुए समस्त लोकों को प्रकाशित करते हैं, किंतु जब सूर्य उत्तर दिशा में रहता है, तब दक्षिण भाग को कम प्रकाश मिलता है और जब सूर्य दक्षिण दिशा में रहता है, तब उत्तर भाग को कम प्रकाश मिलता है। राजा प्रियव्रत को यह स्थिति पसंद नहीं आई इसलिए उन्होंने संकल्प किया कि ब्रह्मांड के उस भाग में जहाँ रात्रि है, वहाँ वे दिन कर देंगे। उन्होंने एक प्रकाशमान रथ पर चढ़कर सूर्यदेव की कक्षा का अनुसरण करके अपनी इच्छा पूर्ण की। वे ऐसे अद्भुत कार्य इसलिए कर पाए, क्योंकि उन्होंने भगवान् की उपासना के द्वारा शक्ति अर्जित की थी।
While ruling the kingdom in this manner, King Priyavrata once became dissatisfied with the orbit of the mighty Sun God. The Sun God, riding on his chariot, moves around Mount Sumeru and illuminates all the worlds, but when the Sun is in the north, the southern part receives less light and when the Sun is in the south, the northern part receives less light. King Priyavrata did not like this situation, so he resolved to make it day in that part of the universe where it is night. He fulfilled his desire by riding on a bright chariot and chasing the orbit of the Sun God. He was able to perform such amazing feats because he had acquired courage through the worship of God.
तात्पर्य
ऐसा एक बांग्ला मुहावरा है जिसका इस्तेमाल यह बताने के लिए किया जाता है कि कोई इतना ताकतवर है कि वह रात को दिन और दिन को रात बना सकता है। यह मुहावरा इसलिए प्रचलित है कि यह प्रियव्रत की क्षमताओं का वर्णन करता है। उनकी गतिविधियाँ दर्शाती हैं कि वह भगवान के परम व्यक्तित्व की पूजा करके कितने ताकतवर बन गए थे। भगवान कृष्ण को योगेश्वर के रूप में जाना जाता है, जो सभी रहस्यमय शक्तियों का स्वामी है। भगवद गीता (18.78) में कहा गया है कि जहां भी सभी रहस्यमय शक्तियों के स्वामी (यत्र योगेश्वर: कृष्ण:) हैं, वहां विजय, भाग्य और अन्य सभी संपन्नताएं मौजूद होती हैं। भक्ति सेवा बहुत शक्तिशाली है। जब कोई भक्त वह प्राप्त करता है जो वह हासिल करना चाहता है, तो यह उसकी अपनी रहस्यमय शक्ति से नहीं होता है बल्कि रहस्यमय शक्ति के स्वामी भगवान कृष्ण की कृपा से होता है: उनकी कृपा से, एक भक्त अद्भुत चीजें हासिल कर सकता है, जो सबसे शक्तिशाली वैज्ञानिक के लिए भी अकल्पनीय हैं। इस श्लोक के वर्णन से पता चलता है कि सूर्य गतिशील है। आधुनिक खगोलविदों के अनुसार, सूर्य एक निश्चित स्थान पर स्थिर है, जो सौर मंडल से घिरा हुआ है, लेकिन यहां हम पाते हैं कि सूर्य स्थिर नहीं है: यह एक निर्धारित कक्षा में घूम रहा है। इस तथ्य की पुष्टि ब्रह्म-संहिता (5.52) करती है। यस्याज्ञय भ्रमति संभृता-काल-चक्र: भगवान के परम व्यक्तित्व के आदेश के अनुसार सूर्य अपनी निश्चित कक्षा में घूम रहा है। ज्योतिष वेद के अनुसार, वैदिक साहित्य में खगोल विज्ञान का विज्ञान, सूर्य छह महीने सुमेरु पर्वत के उत्तरी तरफ और छह महीने दक्षिणी तरफ चलता है। इस ग्रह पर हमारा व्यावहारिक अनुभव यह है कि जब उत्तर में गर्मी होती है तो दक्षिण में सर्दी होती है और इसके विपरीत। आधुनिक भौतिकवादी वैज्ञानिक कभी-कभी खुद को सूर्य के सभी तत्वों को जानने वाले के रूप में पेश करते हैं, फिर भी वे महाराज प्रियव्रत के दूसरे सूर्य की तरह एक दूसरा सूर्य नहीं दे सकते हैं। यद्यपि महाराज प्रियव्रत ने सूर्य की तरह तेजस्वी एक बहुत शक्तिशाली रथ तैयार किया था, लेकिन उनकी सूर्य देव के साथ प्रतिस्पर्धा करने की कोई इच्छा नहीं थी, क्योंकि एक वैष्णव कभी भी दूसरे वैष्णव से ऊपर उठना नहीं चाहता है। उनका उद्देश्य भौतिक अस्तित्व में प्रचुर लाभ देना था। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने कहा है कि अप्रैल और मई के महीनों में महाराज प्रियव्रत के चमकीले सूर्य की किरणें चंद्रमा की किरणों की तरह ही प्रसन्न करने वाली होती थीं, और अक्टूबर और नवंबर में, सुबह और शाम दोनों बार, उस सूर्य ने धूप से भी अधिक गर्मी प्रदान की। संक्षेप में, महाराज प्रियव्रत अत्यंत शक्तिशाली थे, और उनके कार्यों ने हर दिशा में उनकी शक्ति का विस्तार किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥