अपनी इंद्रियों को वश में करने के बाद, तीनों भाइयों ने अपने मन को वासुदेव, भगवान कृष्ण के चरण कमलों पर केंद्रित कर दिया। जैसा कि भगवद्-गीता (7.19) में कहा गया है, वासुदेव: सर्वम इति। वासुदेव के चरण कमल ही सब कुछ हैं। भगवान वासुदेव सभी जीवों के आश्रय हैं। जब यह ब्रह्मांडीय प्रकटीकरण विलीन हो जाता है, तो सभी जीव भगवान के परम शरीर, गर्भोदकाशीय विष्णु में प्रवेश करते हैं, जो महा-विष्णु के शरीर में विलीन हो जाते हैं। ये दोनों विष्णु-तत्व वासुदेव-तत्व हैं, और इसलिए महान ऋषि कवि, महावीर और सवन ने हमेशा भगवान वासुदेव, कृष्ण के चरण कमलों पर ध्यान केंद्रित किया। इस तरह वे समझ सके कि हृदय के भीतर परमात्मा भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व है, और वे उससे अपनी पहचान बना सके। इस अहसास का पूरा वर्णन यह है कि केवल भक्ति सेवा के अमिश्र रूप का निर्वहन करके ही कोई अपने आप को पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकता है। इस श्लोक में वर्णित परम-भक्ति-योग का अर्थ है कि एक जीव, भक्ति सेवा के अमिश्र रूप के माध्यम से, भगवान की सेवा के अलावा कोई अन्य रुचि नहीं रखता है, जैसा कि भगवद्-गीता (वासुदेव: सर्वम इति) में वर्णित है। परम-भक्ति-योग से, प्रेममय सेवा के उच्चतम मंच पर स्वयं को ऊपर उठाकर, कोई स्वचालित रूप से जीवन की शारीरिक अवधारणा से मुक्त हो सकता है और भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व आमने-सामने देख सकता है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता में पुष्टि की गई है:
प्रेमाण्जन-चुरिता-भक्ति-विलोचनेन
संतः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति
यम् श्यामसुंदरम् अचिंत्य-गुण-स्वरूपम्
गोविन्दम् आदि-पुरुषम् तम अहं भजामि
एक उन्नत भक्त, जिसे सत, या संत के रूप में जाना जाता है, हमेशा अपने हृदय में भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, आमने-सामने देख सकता है। कृष्ण, श्यामसुंदर, अपने पूर्ण भाग द्वारा स्वयं का विस्तार करते हैं, और इस प्रकार एक भक्त उन्हें हमेशा अपने हृदय में देख सकता है।
