श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  5.1.24 
अथ च दुहितरं प्रजापतेर्विश्वकर्मण उपयेमे बर्हिष्मतीं नाम तस्यामु ह वाव आत्मजानात्मसमानशीलगुणकर्मरूपवीर्योदारान्दश भावयाम्बभूव कन्यां च यवीयसीमूर्जस्वतीं नाम ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
तदनंतर, महाराज प्रियव्रत ने प्रजापति विश्वकर्मा की कन्या बर्हिष्मती से विवाह किया। उससे उन्हें दस पुत्र उत्पन्न हुए जो सुंदरता, चरित्र, उदारता और अन्य गुणों में उनके समान थे। उनकी एक पुत्री भी हुई जो सबसे छोटी थी। उसका नाम ऊर्जस्वती था।
 
Thereafter Maharaj Priyavrat married Barhishmati, the daughter of Prajapati Vishwakarma. From her he got ten sons who were similar to him in beauty, character, generosity and other qualities. He also had a daughter who was the youngest. Her name was Urjaswati.
तात्पर्य
महाराज प्रियव्रत ने न केवल सरकार के कार्य को स्वीकार करके भगवान ब्रह्मा के आदेशों का पालन किया, बल्कि प्रजापतियों में से एक, विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिस्मती से भी विवाह किया। चूँकि महाराज प्रियव्रत आध्यात्मिक ज्ञान में पूर्ण रूप से प्रशिक्षित थे, वे घर लौट कर ब्रह्मचारी के रूप में सरकार का संचालन कर सकते थे। हालाँकि, घर लौटने पर उन्होंने पत्नी को भी स्वीकार किया। सिद्धांत यह है कि गृहस्थ के रूप में व्यक्ति को उस व्यवस्था में पूर्णता से रहना चाहिए, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति को पत्नी और बच्चों के साथ शांति से रहना चाहिए। जब चैतन्य महाप्रभु की पहली पत्नी का निधन हो गया, तो उनकी माँ ने उनसे दूसरी बार विवाह करने का अनुरोध किया। तब वह बीस वर्ष के थे और चौबीस की आयु में संन्यास लेने जा रहे थे, फिर भी अपनी माँ के अनुरोध पर उन्होंने विवाह किया। उन्होंने अपनी माँ से कहा, "जब तक मैं घर गृहस्थ जीवन में हूँ," "मेरे पास पत्नी होनी चाहिए, क्योंकि गृहस्थ जीवन का अर्थ घर में रहना नहीं है। वास्तविक गृहस्थ जीवन का मतलब है पत्नी के साथ घर में रहना।"इस श्लोक में तीन शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं - उ ह वावा। इन शब्दों का प्रयोग आश्चर्य व्यक्त करने के लिए किया जाता है। प्रियव्रत महाराज ने त्याग का व्रत लिया था, लेकिन पत्नी को स्वीकार करने और बच्चे पैदा करने का त्याग के मार्ग से कोई लेना-देना नहीं है; ये भोग के मार्ग की गतिविधियाँ हैं। इसलिए, यह बहुत आश्चर्य की बात थी कि त्याग के पथ का अनुसरण करने वाले प्रियव्रत महाराज ने अब भोग के पथ को स्वीकार कर लिया।कभी-कभी हमारी आलोचना इस प्रकार की जाती है कि मैं एक संन्यासी हूँ, फिर भी मैंने अपने शिष्यों के विवाह समारोहों में भाग लिया है। हालाँकि, यह समझाया जाना चाहिए कि चूँकि हमने एक कृष्ण चेतन समाज शुरू किया है और चूंकि एक मानव समाज में आदर्श विवाह भी होने चाहिए, इसलिए एक आदर्श समाज को सही ढंग से स्थापित करने के लिए हमें इसके कुछ सदस्यों के विवाह में भाग लेना होगा, यद्यपि हम त्याग के मार्ग पर चल पड़े हैं। यह उन लोगों के लिए आश्चर्यजनक हो सकता है जो दैव-वर्णाश्रम, चार सामाजिक व्यवस्थाओं और चार आध्यात्मिक व्यवस्थाओं की पारलौकिक प्रणाली को स्थापित करने में बहुत रुचि नहीं रखते हैं। हालाँकि, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर दैव-वर्णाश्रम को फिर से स्थापित करना चाहते थे। दैव-वर्णाश्रम में जन्मसिद्ध अधिकार के अनुसार सामाजिक स्थिति की स्वीकृति नहीं हो सकती क्योंकि भगवद-गीता में कहा गया है कि निर्णायक विचार गुण और कर्म, व्यक्ति के गुण और कार्य हैं। दैव-वर्णाश्रम ही वह है जिसे कृष्ण चेतना के लिए एक पूर्ण समाज को जारी रखने के लिए पूरे विश्व में स्थापित किया जाना चाहिए। यह मूर्ख आलोचकों के लिए आश्चर्यजनक हो सकता है, लेकिन यह कृष्ण चेतन समाज के कार्यों में से एक है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)