श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  5.1.21 
भगवानपि मनुना यथावदुपकल्पितापचिति: प्रियव्रतनारदयोरविषममभिसमीक्षमाणयोरात्मसमवस्थानमवाङ्‍मनसं क्षयमव्यवहृतं प्रवर्तयन्नगमत् ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
इसके पश्चात् मनु ने विधिवत पूजा कर ब्रह्माजी को संतुष्ट किया। प्रियव्रत तथा नारद ने भी किसी प्रकार का विरोध किए बिना ब्रह्माजी की ओर देखा। प्रियव्रत से उसके पिता की मनौती स्वीकार करवाकर ब्रह्माजी अपने धाम सत्यलोक चले गए, जिसका वर्णन भौतिक मन तथा वाणी से परे है।
 
After this, Manu satisfied Brahmaji and performed the ritualistic worship. Priyavrat and Narada also looked at Brahmaji without showing any opposition. After making Priyavrat accept his father's wish, Brahmaji went to his abode Satyalok, the description of which is beyond the physical mind and speech.
तात्पर्य
निश्चित रूप से मनु यह जानकर बहुत प्रसन्न थे कि भगवान ब्रह्मा ने अपने पुत्र प्रियव्रत को संसार के शासन की ज़िम्मेदारी लेने के लिए मना लिया। प्रियव्रत और नारद भी बहुत प्रसन्न थे। हालांकि ब्रह्मा ने प्रियव्रत को सांसारिक मामलों का प्रबंधन स्वीकार करने के लिए मजबूर किया, और इस प्रकार ब्रह्मचर्य रहने और पूरी तरह से भक्ति-सेवा में संलग्न रहने की अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी, नारद और प्रियव्रत ने ब्रह्मा को नाराज़गी के साथ नहीं देखा। नारद को इस बात का ज़रा भी अफ़सोस नहीं था कि प्रियव्रत को अपना शिष्य बनाने में उन्हें निराशा हुई। प्रियव्रत और नारद दोनों ही महान व्यक्तित्व थे जो जानते थे कि भगवान ब्रह्मा का सम्मान कैसे किया जाता है। इसलिए, ब्रह्मा को नाराज़गी से देखने के बजाय, उन्होंने बहुत भावुकता से उनका सम्मान किया। तब भगवान ब्रह्मा अपने स्वर्गीय निवास सत्यलोक लौट गए, जिसे यहाँ त्रुटिहीन और शब्दों से अप्राप्य बताया गया है। इस श्लोक में कहा गया है कि भगवान ब्रह्मा अपने निवास लौट गए, जो उनके अपने व्यक्तित्व जितना ही महत्वपूर्ण है। भगवान ब्रह्मा इस ब्रह्मांड के निर्माता और इसके भीतर सबसे महान व्यक्तित्व हैं। उनका जीवनकाल भगवद गीता (8.17) में वर्णित है। सहस्त्र-युग-पर्यंतं अहर यद् ब्रह्मणो विदुः। चार युगों की कुल अवधि 4,300,000 वर्ष है, और जब इसे एक हज़ार गुना बढ़ाया जाता है, तो यह ब्रह्मा के जीवन में बारह घंटे के बराबर होता है। इसलिए हम वास्तव में ब्रह्मा के जीवन के बारह घंटे भी नहीं समझ सकते, उनके पूरे जीवनकाल के सौ वर्षों की तो बात ही छोड़िए। तो, हम उनके निवास को कैसे समझ सकते हैं? वैदिक साहित्य बताते हैं कि सत्यलोक में कोई जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा या बीमारी नहीं है। दूसरे शब्दों में, चूंकि सत्यलोक ब्रह्मलोक या ब्रह्म तेज के बगल में स्थित है, इसलिए यह वैकुंठलोक जितना ही अच्छा है। भगवान ब्रह्मा का निवास व्यावहारिक रूप से हमारी वर्तमान स्थिति से अवर्णनीय है। इसलिए इसे अवँग-मनस-गोचर, या हमारे शब्दों के वर्णन और हमारे मन की कल्पना से परे बताया गया है। श्रीमद्भागवतम् (2.2.26-27) में भगवान ब्रह्मा के निवास का वर्णन इस प्रकार है: यद् द्वै परार्ध्यम् तदु पारमेष्ट्यं न यत्र शोको न जरा न मृत्युर्नार्तिर्न चोद्वेगः। "सत्यलोक में, जो लाखों और अरबों वर्ष दूर स्थित है, वहाँ कोई विलाप नहीं है, न बुढ़ापा है, न मृत्यु है, न चिंता है और न ही शत्रुओं का प्रभाव है।" (एस.बी. 2.2.26-27)
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)