श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा- इस प्रकार तीनों लोकों के गुरु ब्रह्माजी द्वारा भलीभाँति उपदेश दिये जाने पर अपना पद छोटा होने के कारण प्रियव्रत ने नमस्कार करते हुए उनका आदेश शिरोधार्य किया और अत्यन्त आदरपूर्वक उसका पालन किया।
Sri Shukdev Goswami further said - In this way, after being thoroughly instructed by Brahmaji, the Guru of the three worlds, due to his low status, Priyavrata bowed to him, accepted his orders and followed them with utmost respect.
तात्पर्य
श्री प्रियव्रत भगवान ब्रह्मा के पौत्र थे। अतः सामाजिक शिष्टाचार के अनुसार, उनका पद निम्न था। निम्न का कर्तव्य पूरे सम्मान के साथ उच्चतर का आदेश पालन करना है। प्रियव्रत ने इसलिए तुरंत कहा, "जी हाँ, महोदय। मैं आपका आदेश पालन करूंगा।" प्रियव्रत को महा-भागवत, एक महान भक्त के रूप में वर्णित किया गया है। एक महान भक्त का कर्तव्य आध्यात्मिक गुरु के आदेश का पालन करना है, या परंपरा प्रणाली में आध्यात्मिक गुरु के आध्यात्मिक गुरु का। जैसा कि भगवद-गीता (4.2) में वर्णित है, एवं परंपरा प्राप्त: किसी को आध्यात्मिक गुरुओं की शिष्य-परंपरा के माध्यम से सर्वोच्च प्रभु के निर्देश प्राप्त करने होते हैं। प्रभु का एक भक्त हमेशा खुद को प्रभु के सेवक के सेवक के सेवक के रूप में मानता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥