श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  5.1.19 
त्वं त्वब्जनाभाङ्‌घ्रिसरोजकोश-
दुर्गाश्रितो निर्जितषट्‌सपत्न: ।
भुङ्‌क्ष्वेह भोगान् पुरुषातिदिष्टान्
विमुक्तसङ्ग: प्रकृतिं भजस्व ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी ने आगे कहा - हे प्रियव्रत, जो भगवान कमल के फूल जैसी नाभि वाले हैं, उन भगवान के चरणकमल के पास शरण लेकर छह ज्ञान इंद्रियों पर विजय प्राप्त करो। तुम भौतिक सुख-सुविधाओं का आनंद लो, क्योंकि भगवान ने तुम्हें ऐसा करने का आदेश दिया है। इस तरह तुम भौतिक संसार से मुक्त हो जाओगे और अपने स्वभाविक कर्तव्यों का पालन कर पाओगे।
 
Brahmaji further said—O Priyavrata, take shelter in the lotus feet of Kamalnabh Ishwar and conquer the six senses. Accept material pleasures and enjoyments because the Lord has specifically instructed you to do so. In this way you will be free from material association and will be able to fulfill the orders of the Lord while remaining in your natural state.
तात्पर्य
इस भौतिक संसार में तीन प्रकार के पुरुष हैं। जो इंद्रियों का भरपूर आनंद लेने का प्रयास करते हैं उन्हें कर्मी कहते हैं, उनके ऊपर ज्ञानी होते हैं, जो इंद्रियों के आग्रहों पर विजय पाने का प्रयास करते हैं, और उनके ऊपर योगी होते हैं, जिन्होंने पहले से ही इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है। हालाँकि, उनमें से कोई भी व्यक्तिगत स्थिति में नहीं होता है। केवल भक्त, जो उपर्युक्त किसी भी समूह से संबंधित नहीं होते हैं, व्यक्तिगत होते हैं। जैसा कि भगवद-गीता (14.26) में वर्णित है:

माँ च योऽव्यभिचारेण

भक्ति-योगेन सेवते

स गुणान समतीत्यैतान

ब्रह्म-भूयाय कल्पते

"जो कोई भी पूर्ण भक्ति सेवा में संलग्न होता है, जो किसी भी परिस्थिति में नहीं गिरता है, वह तुरंत भौतिक प्रकृति के तरीकों को पार कर जाता है और इस तरह ब्रह्म के स्तर पर आ जाता है।" भगवान ब्रह्मा ने यहाँ प्रियव्रत को पारिवारिक जीवन के किले में नहीं बल्कि भगवान के कमल चरणों (अब्ज-नाभाँघ्री-सरोजा) में व्यक्तिगत रहने की सलाह दी है। जब एक भौंरा कमल के फूल के उद्घाटन में प्रवेश करता है और उसका शहद पीता है, तो वह कमल की पंखुड़ियों द्वारा पूरी तरह से संरक्षित होता है। मधुमक्खी धूप और अन्य बाहरी प्रभावों से अछूती है। इसी तरह, जो हमेशा भगवान के व्यक्तित्व के कमल चरणों में शरण लेता है, वह सभी खतरों से सुरक्षित रहता है। इसलिए श्रीमद-भागवतम (10.14.58) में कहा गया है:

समाश्रिता ये पदा-पल्लव-प्लवं

महत-पदं पुण्य-यशो मुरारेः

भवोंबुधिर्वत्स-पदं परं पदं

पदं पदं यद् विपदाम न तेषां

जो भगवान के कमल चरणों की शरण में ले जाते हैं, उनके लिए सब कुछ आसान हो जाता है। वास्तव में, अज्ञानता के महान सागर (भवोंबुधि) को पार करना भी एक बछड़े (वत्स-पदम) द्वारा बनाए गए खुरों के निशान को पार करने जैसा है। ऐसे भक्त के लिए, ऐसी जगह में रहने का कोई सवाल ही नहीं है जहाँ हर कदम खतरनाक हो।

हमारा वास्तविक कर्तव्य भगवान के व्यक्तित्व के सर्वोच्च आदेश को पूरा करना है। यदि हम प्रभु के सर्वोच्च आदेश को पूरा करने के अपने दृढ़ संकल्प में निश्चित हैं, तो हम हमेशा सुरक्षित हैं, चाहे हम कहीं भी हों, चाहे नर्क में या स्वर्ग में। यहाँ शब्द प्रकृति भजस्वा बहुत महत्वपूर्ण हैं। प्रकृति अपने संवैधानिक पद का उल्लेख करता है। प्रत्येक जीवित इकाई में ईश्वर का शाश्वत सेवक होने की संवैधानिक स्थिति होती है। इसलिए भगवान ब्रह्मा ने प्रियव्रत को सलाह दी, "भगवान के शाश्वत सेवक के रूप में अपनी मूल स्थिति में रहें। यदि आप उसके आदेशों का पालन करते हैं, तो तुम कभी नहीं गिरोगे, भले ही भौतिक आनंद के बीच में हो।" किसी की कामुक गतिविधियों के कारण प्राप्त भौतिक आनंद भगवान के व्यक्तित्व द्वारा दिए गए भौतिक आनंद से भिन्न है। एक भक्त कभी-कभी बहुत ही संपन्न स्थिति में दिखाई देता है, लेकिन वह उस स्थिति को भगवान के व्यक्तित्व के सर्वोच्च आदेशों का पालन करने के लिए स्वीकार करता है। इसलिए एक भक्त भौतिक प्रभावों से कभी प्रभावित नहीं होता है। कृष्ण चेतना आंदोलन में भक्त पूरी दुनिया में श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश के अनुसार प्रचार कर रहे हैं। उन्हें कई कर्मियों से मिलना है, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु की दया से वे भौतिक प्रभावों से अप्रभावित हैं। उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया है, जैसा कि चैतन्य-चरितामृत (मध्य 7.129) में वर्णित है:

कभु ना बाधिबे तोमारा विषय-तरंगा

पुनरपि एई थाँई पबे मोरा संगा

एक निष्ठावान भक्त जो पूरी दुनिया में अपने पंथ का प्रचार करके भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा में संलग्न है, वह विषय-तरंगा, भौतिक प्रभावों से कभी प्रभावित नहीं होगा। इसके विपरीत, समय बीतने के साथ वह भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के कमल चरणों के आश्रय में लौट आएगा और इस प्रकार उसके साथ सदा संपर्क रहेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)