गृहस्थ जीवन में स्थित रहकर जो व्यक्ति अपने मन और पाँचों इंद्रियों पर व्यवस्थित ढंग से विजय प्राप्त कर लेता है, वह उस राजा के समान होता है जो अपने किले में रहकर अपने शक्तिशाली शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है। गृहस्थाश्रम में प्रशिक्षित हो जाने के बाद और अपनी काम-वासनाओं को कम कर लेने के बाद, मनुष्य बिना किसी भय के कहीं भी विचरण कर सकता है।
A person who conquers his mind and the five senses in a proper manner while living in the Grahasthashram is like a king who defeats his powerful enemies while living in his fort. After getting trained in the Grahasthashram and by reducing the lustful desires, a person can roam anywhere without any fear.
तात्पर्य
चार वर्णों और चार आश्रमों की वैदिक प्रणाली बहुत वैज्ञानिक है, और इसका पूरा उद्देश्य व्यक्ति को इंद्रियों को नियंत्रित करना सिखाना है | घर गृहस्थी (गृहस्थ आश्रम) में प्रवेश करने से पहले, एक छात्र को पूरी तरह से जितेंद्रिय, इंद्रियों पर विजय पाने वाले बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है| ऐसे परिपक्व छात्र को एक गृहस्थ बनने की अनुमति दी जाती है, और क्योंकि उन्हें पहले अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षित किया गया था, वह गृहस्थ जीवन से सेवानिवृत्त हो जाते हैं और जैसे ही युवा जीवन की प्रबल लहरें बीत जाती हैं और वह पचास वर्ष की आयु या उससे थोड़ी अधिक उम्र में वृद्धावस्था के कगार पर पहुंच जाता है, वह तपस्वी बन जाते हैं| फिर, आगे प्रशिक्षित होने के बाद, वह सन्यास स्वीकार कर लेते हैं| वह तब पूरी तरह से शिक्षित और त्यागी व्यक्ति होता है जो भौतिक इच्छाओं से मोहित होने के डर के बिना कहीं भी और हर जगह जा सकता है| इंद्रियों को बहुत शक्तिशाली शत्रु माना जाता है| जैसे एक मजबूत किले में एक राजा शक्तिशाली दुश्मनों पर विजय प्राप्त कर सकता है, वैसे ही गृहस्थ आश्रम में एक गृहस्थ, गृहस्थ जीवन, युवाओं की कामुक इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर सकता है और जब वह वानप्रस्थ और सन्यास लेता है तो उसे बहुत सुरक्षित हो जाता है|
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥