श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.1.17 
भयं प्रमत्तस्य वनेष्वपि स्याद्
यत: स आस्ते सहषट्‌सपत्न: ।
जितेन्द्रियस्यात्मरतेर्बुधस्य
गृहाश्रम: किं नु करोत्यवद्यम् ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
इन्द्रियों के वशीभूत मनुष्य को वन-वन भटकते रहने पर भी बंधन का भय बना रहता है क्योंकि वह मन और ज्ञानेन्द्रियाँ—इन छह सपत्नियों के साथ जी रहा होता है। परंतु आत्मतुष्ट विद्वान ने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, इसलिए गृहस्थ जीवन उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाता।
 
A man who is under the control of his senses, even if he roams from forest to forest, still he is afraid of bondage because he is living with these six wives - the mind and the senses. But a self-satisfied scholar who has controlled his senses, family life does not harm him.
तात्पर्य
श्रील नरोट्टम दास ठाकुर ने गाया है, गृहे वा वनेते ठाके, ‘हा गौरांग’ बले डाके। अर्थात कोई वन में हो या घर में, यदि वह भगवान चैतन्य के भक्ति-भाव से भरा हो तो उसे मुक्त व्यक्ति कहा जा सकता है। यहाँ भी यही बात दोहराई गयी है। जिसने अपनी इंद्रियों को अपने नियंत्रण में नहीं लिया है उसके लिए तथाकथित योगी बनने के लिए वन में चले जाना अर्थहीन है। इसलिए कि उसका मन और इंद्रियाँ उसके साथ ही होती हैं, और वह किसी भी तरह से कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाता, घर-बार त्यागकर और जंगल में रहकर भी। पहले भारत के ग्रामीण भागों से कई व्यापारी बंगाल में आया करते थे, और यहाँ पर एक कहावत भी प्रचलित थी, “यदि तुम बंगाल जाते हो, तो तुम्हारा भाग्य भी तुम्हारे साथ चलेगा।” इसलिए, हमारी सर्वप्रथम चिंता अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना होना चाहिए, और इंद्रियों को भगवान की भक्ति-सेवा में लगे बिना नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसलिए, हमारा सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है अपनी इंद्रियों को भक्ति-सेवा में लगाना। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते अर्थात भक्ति का अर्थ है भगवान की सेवा में हमारी शुद्ध इंद्रियों को लगाना।

यहाँ पर ब्रह्मा जी बता रहे हैं कि इंद्रियों को नियंत्रण में न रखकर जंगल में जाने के बजाय, इंद्रियों को भगवान की सेवा में लगाना बेहतर और अधिक सुरक्षित है। घर-आश्रम भी इस तरह कार्य करने वाले एक आत्म-संयमी व्यक्ति को हानि नहीं पहुँचा सकता, वह उन्हें भौतिक बंधन में नहीं डाल सकता। श्रील रूप गोस्वामी ने इस स्थिति को और अधिक स्पष्ट किया है-

ईहा यस्य हरिदास्ये

कर्माणा मनसा गिरा

निखिलास्व अप्य वस्थासु

जीवन्मुक्तः स उच्यते

“कोई व्यक्ति चाहे किसी भी स्थिति में हो, यदि वह अपनी सभी गतिविधियों, मन, वाणी को भगवान की भक्ति-सेवा में पूर्ण रूप से लगा देता है, तो उसे मुक्त व्यक्ति समझना चाहिए।” श्रील भक्तिविनोद ठाकुर एक जिम्मेदार अधिकारी होने के साथ-साथ एक गृहस्थ भी थे, इसके बावजूद भगवान चैतन्य महाप्रभु के मिशन का विस्तार करने में उनकी सेवा अद्वितीय रही। श्रील प्रबोधानंद सरस्वती ठाकुर कहते हैं, दुर्दांतेंद्रिय-काल-सर्प-पटली प्रोत्खात-दंष्ट्रायते। इंद्रियाँ निश्चित रूप से हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं, और इसलिए उनकी तुलना विषैले सर्पों से की गयी है। हालाँकि, यदि कोई जहरीला साँप अपने जहरीले नागों से वंचित हो जाए, तो वह अब डरावना नहीं रह जाता। ऐसे ही, यदि इंद्रियाँ भगवान की सेवा में लग जाएं, तो उनके कार्यों से डरने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। कृष्ण भावना आंदोलन के भक्त इस भौतिक संसार के भीतर रहते हैं, लेकिन क्योंकि उनकी इंद्रियाँ पूरी तरह से भगवान की सेवा में लगी हुई हैं, इसलिए वे भौतिक संसार से हमेशा अलग रहते हैं। वे हमेशा एक दिव्य स्थिति में रहते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)