यहाँ पर ब्रह्मा जी बता रहे हैं कि इंद्रियों को नियंत्रण में न रखकर जंगल में जाने के बजाय, इंद्रियों को भगवान की सेवा में लगाना बेहतर और अधिक सुरक्षित है। घर-आश्रम भी इस तरह कार्य करने वाले एक आत्म-संयमी व्यक्ति को हानि नहीं पहुँचा सकता, वह उन्हें भौतिक बंधन में नहीं डाल सकता। श्रील रूप गोस्वामी ने इस स्थिति को और अधिक स्पष्ट किया है-
ईहा यस्य हरिदास्ये
कर्माणा मनसा गिरा
निखिलास्व अप्य वस्थासु
जीवन्मुक्तः स उच्यते
“कोई व्यक्ति चाहे किसी भी स्थिति में हो, यदि वह अपनी सभी गतिविधियों, मन, वाणी को भगवान की भक्ति-सेवा में पूर्ण रूप से लगा देता है, तो उसे मुक्त व्यक्ति समझना चाहिए।” श्रील भक्तिविनोद ठाकुर एक जिम्मेदार अधिकारी होने के साथ-साथ एक गृहस्थ भी थे, इसके बावजूद भगवान चैतन्य महाप्रभु के मिशन का विस्तार करने में उनकी सेवा अद्वितीय रही। श्रील प्रबोधानंद सरस्वती ठाकुर कहते हैं, दुर्दांतेंद्रिय-काल-सर्प-पटली प्रोत्खात-दंष्ट्रायते। इंद्रियाँ निश्चित रूप से हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं, और इसलिए उनकी तुलना विषैले सर्पों से की गयी है। हालाँकि, यदि कोई जहरीला साँप अपने जहरीले नागों से वंचित हो जाए, तो वह अब डरावना नहीं रह जाता। ऐसे ही, यदि इंद्रियाँ भगवान की सेवा में लग जाएं, तो उनके कार्यों से डरने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। कृष्ण भावना आंदोलन के भक्त इस भौतिक संसार के भीतर रहते हैं, लेकिन क्योंकि उनकी इंद्रियाँ पूरी तरह से भगवान की सेवा में लगी हुई हैं, इसलिए वे भौतिक संसार से हमेशा अलग रहते हैं। वे हमेशा एक दिव्य स्थिति में रहते हैं।
