श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.1.15 
ईशाभिसृष्टं ह्यवरुन्ध्महेऽङ्ग
दु:खं सुखं वा गुणकर्मसङ्गात् ।
आस्थाय तत्तद्यदयुङ्क्त नाथ-
श्चक्षुष्मतान्धा इव नीयमाना: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरे प्यारे प्रियव्रत, विभिन्न प्रकार के पदार्थों की प्रकृति के साथ हमारे जुड़ाव के अनुसार, भगवान हमें विशेष शरीर और सुख और दुख देते हैं जो हम प्राप्त करते हैं। इसलिए व्यक्ति को उसी रूप में रहना चाहिए जैसा वह है और भगवान द्वारा उसी प्रकार निर्देशित किया जाना चाहिए जैसे एक नेत्रहीन व्यक्ति को एक दृष्टि वाले व्यक्ति द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त होता है।
 
O Priyavrata, the Lord gives us different bodies with different qualities according to our association with Him and we experience pleasure and pain. Therefore, a man should remain as he is and seek guidance from the Lord as a blind man seeks guidance from a man with eyes.
तात्पर्य
भौतिक साधनों से व्यक्ति अपने विशेष शरीर के लिए विशिष्ट सुख और दुख से बच नहीं सकता। 8,400,000 शारीरिक रूप हैं और प्रत्येक को निश्चित मात्रा में सुख और दुख को भोगने और सहन करने के लिए नियत किया गया है। हम इसे बदल नहीं सकते हैं, क्योंकि सुख और दुख परम भगवान द्वारा निर्देशित होते हैं, जिसके निर्णय के अनुसार हमने अपने शरीर प्राप्त किए हैं। चूँकि हम परम ईश्वर की योजना से बच नहीं सकते हैं, हमें उसके द्वारा निर्देशित होने के लिए सहमत होना चाहिए, जैसे कि एक अंधा व्यक्ति उस व्यक्ति द्वारा नेतृत्व किया जाता है जिसकी आँखें होती हैं। किसी भी परिस्थिति में, यदि हम परमेश्वर द्वारा हमें आवंटित स्थिति में रहते हैं और उसके निर्देशों का पालन करते हैं, तो हम पूर्ण हो जाएँगे। जीवन का मुख्य उद्देश्य परम भगवान के निर्देशों का पालन करना है। ऐसे निर्देश ही किसी के धर्म या व्यावसायिक कर्तव्य का निर्माण करते हैं। इसलिए भगवद-गीता में, भगवान कृष्ण कहते हैं, सर्व-धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज: "सभी अन्य व्यस्तताओं को छोड़ो। बस मेरे आत्मसमर्पण करो और मेरा अनुसरण करो।" (भगवद गीता।18.66) परम भगवान के निर्देशों का पालन करके समर्पण करने की यह प्रक्रिया किसी विशेष जाति या पंथ के लिए नहीं है। एक ब्राह्मण समर्पण कर सकता है, और एक क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र भी कर सकता है। हर कोई इस प्रक्रिया को अपना सकता है। जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है, चक्षुष्मतान्धैवनीयमान: व्यक्ति को उस तरह से भगवान का पालन करना चाहिए जैसे एक अंधा व्यक्ति उस व्यक्ति का अनुसरण करता है जिसकी आँखें होती हैं। यदि हम वेदों और भगवद-गीता में दिए गए निर्देशों का पालन करके परम भगवान का अनुसरण करते हैं, तो हमारा जीवन सफल होगा। इसलिए भगवान कहते हैं: मन-मना भव मद्-भक्तो मद्यजी मां नमस्करु मां एवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे "हमेशा मेरे बारे में सोचो, मेरे भक्त बनो और मुझ पर सम्मान और वंदना करो। तब तुम निश्चित रूप से स्वर्ग वापस आओगे, भगवान के पास वापस आओगे मैं तुमसे यह वादा करता हूँ क्योंकि तुम मेरे बहुत प्रिय मित्र हो।" (भगवद गीता।18.65) यह निर्देश सभी के लिए है - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र। जीवन के किसी भी विभाजन से कोई भी व्यक्ति यदि परम भगवान के प्रति समर्पण करता है और उनके निर्देशों का पालन करता है, तो उसका जीवन सफल होगा। पिछले श्लोक में बैलों की सादृश्यता दी गई है, जो एक बैलगाड़ी के चालक के निर्देश के अधीन चल रहे हैं। बैल, जो पूरी तरह से चालक के प्रति समर्पित हैं, जहाँ चाहें वह उन्हें रखता है और वही खाते हैं जो वह उन्हें खाने के लिए देता है। इसी तरह, परम भगवान के प्रति पूरी तरह से समर्पित होने के कारण, हमें सुख की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए, या संकट पर पछतावा करना चाहिए; हमें भगवान द्वारा आवंटित स्थिति से संतुष्ट रहना चाहिए। हमें भक्ति सेवा के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए और उस सुख और दुख से असंतुष्ट नहीं होना चाहिए जो उन्होंने दिया है। भौतिक काम और अज्ञान के मोड में लोग आम तौर पर जीवन के अपने 8,400,000 रूपों के साथ परम भगवान की योजना को नहीं समझ सकते हैं, लेकिन मानव रूप किसी को इस योजना को समझने, भक्ति सेवा में संलग्न होने और भगवान के निर्देशों का पालन करके पूर्णता की सर्वोच्च स्थिति में खुद को ऊपर उठाने का विशेष विशेषाधिकार देता है। संपूर्ण विश्व भौतिक प्रकृति के गुणों, विशेष रूप से अज्ञान और जोश के प्रभाव में काम कर रहा है, लेकिन अगर लोग परम भगवान की महिमा के बारे में सुनने और जप करने में संलग्न होते हैं, तो उनका जीवन सफल हो सकता है, और वे उच्चतम पूर्णता तक ऊपर उठ सकते हैं। इसलिए ब्रहान-नारदीय पुराण में कहा गया है: हरि नामा हरि नामा हरि नामैवा केवलम कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा

"कली युग में, आध्यात्मिक पूर्णता के लिए, भगवान के पवित्र नाम से बढ़कर और कोई रास्ता नहीं है, और कोई रास्ता नहीं है, और कोई रास्ता नहीं है।" भगवान के पवित्र नामों को सुनने का अवसर सभी को दिया जाना चाहिए, क्‍योंकि इस प्रकार वह धीरे-धीरे जीवन में अपनी वास्तविक स्थिति को समझ पाएगा और सत्‍व गुण से ऊपर आध्‍यात्मिक स्थिति में उठ पाएगा। इस प्रकार उसकी प्रगति में आने वाली सभी बाधाएँ दूर हो जाएँगी। इसलिए, निष्‍कर्ष यह है कि भगवान द्वारा हमें जिस भी स्थिति में रखा गया हो, उसमें हमें संतुष्‍ट रहना चाहिए और हमें अपनी भक्ति सेवा में लगे रहने का प्रयास करना चाहिए। तब हमारा जीवन सफल होगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)