इसलिए, यद-वाची के तौर पर इस छंद में वर्णित वेदों की आज्ञाओं का पालन करना सबसे अच्छा है| उन आज्ञाओं के अनुसार, हर किसी को यह पता लगाना चाहिए कि वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र है और तदनुसार उसे शिक्षित किया जाना चाहिए| तभी उसका जीवन सफल होगा| अन्यथा, मानव समाज का सारा भ्रमित हो जाएगा| अगर मानव समाज को वैज्ञानिक तरीके से वर्ण और आश्रम के अनुसार विभाजित किया जाए, और अगर वैदिक दिशानिर्देशों का पालन किया जाए, तो हर किसी का जीवन, चाहे उसकी स्थिति कुछ भी क्यों न हो, सफल होगा| ऐसा नहीं है कि केवल ब्राह्मण ही आत्मिक स्तर तक ऊपर उठेंगे लेकिन शूद्र नहीं| अगर वैदिक आज्ञाओं का पालन किया जाए, तो वे सभी - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - आत्मिक स्तर तक ऊपर उठेंगे, और उनका जीवन सफल होगा| वेदों की आज्ञाएँ परमेश्वर के विशेष निर्देश हैं| इस छंद में दिए गए उदाहरण के अनुसार, अपनी नाक में रस्सी से बंधे बैल ड्राइवर के निर्देशानुसार चलते हैं| इसी प्रकार, अगर हम वेदों के निर्देशों के अनुसार चलें, तो हमारे जीवन का सही मार्ग निर्धारित हो जाएगा| अन्यथा, अगर हम उस तरह से नहीं चलते हैं और अपने तुच्छ विचारों के अनुसार चलते हैं, तो हमारा जीवन भ्रम से खराब हो जाएगा और निराशा में खत्म हो जाएगा| दरअसल, क्योंकि आजकल लोग वेदों के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं, इसलिए वे पूरी तरह से भ्रमित हैं| इसलिए हमें जीवन में सफलता दिलाने वाले वास्तविक वैज्ञानिक निर्देशानुसार, भगवान ब्रह्मा द्वारा प्रियव्रत को दिए गए इस निर्देश का पालन करना चाहिए| इसकी पुष्टि भगवद गीता (16.23) में भी की गई है:
यः शास्त्र-विधिम उतृज्य
वर्तते काम-कारतः
न स सिद्धिम अवानोति
ना सुखं ना परां गतिम्
अगर हम शास्त्रों, वेदों की आज्ञाओं के अनुसार नहीं रहते हैं, तो हम जीवन में कभी भी सफलता हासिल नहीं कर पाएंगे, जीवन के उच्च दर्जे पर ऊपर उठने या खुश रहने की तो बात ही छोड़िए|
