श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.1.14 
यद्वाचि तन्त्यां गुणकर्मदामभि:
सुदुस्तरैर्वत्स वयं सुयोजिता: ।
सर्वे वहामो बलिमीश्वराय
प्रोता नसीव द्विपदे चतुष्पद: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरे बालक, वैदिक निर्देशों के अनुसार, हम सभी अपने गुणों और कर्मों के आधार पर वर्णाश्रम विभागों में बँधे हुए हैं। इन विभागों से बचना कठिन है क्योंकि ये वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित हैं। इसलिए, हमें वर्णाश्रम धर्म के अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, जैसे नासिकाओं में बंधी रस्सियों से बंधे हुए बैल चालक के निर्देश के अनुसार चलने को बाध्य होते हैं।
 
O child, we are all bound in Varnashrama divisions by Vedic injunctions according to our Guna and Karma. It is difficult to escape from these divisions, because they are scientifically arranged. Therefore, we should perform the duties of Varnashrama Dharma like bulls who are forced to follow the orders of a driver pulling a bridle tied to their nose.
तात्पर्य
इस श्लोक में 'तन्त्यां गुण-कर्म-दामभि:' शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। हम प्रत्येक को अपनी गुणों से संबद्धता के अनुसार एक शरीर प्राप्त होता है, भौतिक प्रकृति के गुण या विधाएँ और तदनुसार कार्य करते हैं। जैसा कि गीता में कहा गया है, सामाजिक व्यवस्था के चार क्रम - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - को गुण और कर्म के अनुसार, उनके गुणों और कार्य के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है। इस बारे में कुछ विवाद है, क्योंकि कुछ कहते हैं कि चूँकि किसी को उसके पिछले जीवन के गुण और कर्म के अनुसार शरीर प्राप्त होता है, इसलिए उसका जन्म ही उसकी सामाजिक स्थिति को निर्धारित करता है। हालाँकि, अन्य कहते हैं, कि उसके पिछले जीवन के गुण और कर्म के अनुसार उसका जन्म मुख्य विचार नहीं है, क्योंकि कोई भी इस जीवन में भी अपने गुण और कर्म बदल सकता है। इस प्रकार वे कहते हैं कि सामाजिक क्रम के चार विभाजन - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - को इस जीवन के गुण और कर्म के अनुसार व्यवस्थित किया जाना चाहिए। इस संस्करण की पुष्टि श्रीमद-भागवतम में नारद मुनि द्वारा की गई है। गुण और कर्म के लक्षणों के बारे में महाराज युधिष्ठिर को निर्देश देते हुए, नारद मुनि ने कहा कि इन लक्षणों को समाज के विभाजन को नियंत्रित करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, यदि किसी ब्राह्मण के परिवार में जन्मे किसी व्यक्ति में शूद्र के लक्षण हैं, तो उसे शूद्र के रूप में नामित किया जाना चाहिए। इसी तरह, यदि किसी शूद्र में ब्राह्मण जैसी योग्यताएँ हैं, तो उसे ब्राह्मण के रूप में नामित किया जाना चाहिए। वर्णाश्रम व्यवस्था वैज्ञानिक है। इसलिए यदि हम वैदिक निर्देशों के अनुसार वर्ण और आश्रम के विभाजन को स्वीकार करते हैं, तो हमारा जीवन सफल होगा। जब तक मानव समाज को इस प्रकार विभाजित और व्यवस्थित नहीं किया जाता, तब तक वह पूर्ण नहीं हो सकता। जैसा कि विष्णु पुराण (3.8.9) में कहा गया है: "वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान विष्णुराराध्यते पन्था अन्यत्तत्तोष-कारणम्" "परमेश्वर व्यक्ति, भगवान विष्णु, वर्ण और आश्रम की प्रणाली में निर्धारित कर्तव्यों के उचित निष्पादन द्वारा पूजा जाता है। परमेश्वर व्यक्ति को संतुष्ट करने का कोई अन्य तरीका नहीं है।" व्यक्ति को चार वर्णों और आश्रमों की संस्था में अवस्थित होना चाहिए। "सभी मानव समाज भगवान विष्णु की पूजा के लिए है। हालाँकि, वर्तमान समय में, मानव समाज यह नहीं जानता कि यह जीवन का अंतिम लक्ष्य या पूर्णता है। इसलिए भगवान विष्णु की पूजा करने के बजाय, लोगों को पदार्थ की पूजा करने के लिए शिक्षित किया गया है। आधुनिक समाज की दिशा के अनुसार, मनुष्य सोचते हैं कि वे गगनचुंबी इमारतों, बड़ी सड़कों, ऑटोमोबाइल आदि के निर्माण के लिए पदार्थों में हेरफेर करके सभ्यता में आगे बढ़ सकते हैं। ऐसी सभ्यता को निश्चित रूप से भौतिकवादी कहा जाना चाहिए क्योंकि उसके लोग जीवन के लक्ष्य को नहीं जानते हैं। जीवन का लक्ष्य विष्णु तक पहुँचना है, लेकिन विष्णु तक पहुँँचने के बजाय, लोग भौतिक ऊर्जा की बाहरी अभिव्यक्ति से चकित हैं। इसलिए भौतिक उन्नति की प्रगति अंधी है, और ऐसी भौतिक उन्नति के नेता भी अंधे हैं। वे अपने अनुयायियों का गलत तरीके से नेतृत्व कर रहे हैं।

इसलिए, यद-वाची के तौर पर इस छंद में वर्णित वेदों की आज्ञाओं का पालन करना सबसे अच्छा है| उन आज्ञाओं के अनुसार, हर किसी को यह पता लगाना चाहिए कि वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र है और तदनुसार उसे शिक्षित किया जाना चाहिए| तभी उसका जीवन सफल होगा| अन्यथा, मानव समाज का सारा भ्रमित हो जाएगा| अगर मानव समाज को वैज्ञानिक तरीके से वर्ण और आश्रम के अनुसार विभाजित किया जाए, और अगर वैदिक दिशानिर्देशों का पालन किया जाए, तो हर किसी का जीवन, चाहे उसकी स्थिति कुछ भी क्यों न हो, सफल होगा| ऐसा नहीं है कि केवल ब्राह्मण ही आत्मिक स्तर तक ऊपर उठेंगे लेकिन शूद्र नहीं| अगर वैदिक आज्ञाओं का पालन किया जाए, तो वे सभी - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - आत्मिक स्तर तक ऊपर उठेंगे, और उनका जीवन सफल होगा| वेदों की आज्ञाएँ परमेश्वर के विशेष निर्देश हैं| इस छंद में दिए गए उदाहरण के अनुसार, अपनी नाक में रस्सी से बंधे बैल ड्राइवर के निर्देशानुसार चलते हैं| इसी प्रकार, अगर हम वेदों के निर्देशों के अनुसार चलें, तो हमारे जीवन का सही मार्ग निर्धारित हो जाएगा| अन्यथा, अगर हम उस तरह से नहीं चलते हैं और अपने तुच्छ विचारों के अनुसार चलते हैं, तो हमारा जीवन भ्रम से खराब हो जाएगा और निराशा में खत्म हो जाएगा| दरअसल, क्योंकि आजकल लोग वेदों के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं, इसलिए वे पूरी तरह से भ्रमित हैं| इसलिए हमें जीवन में सफलता दिलाने वाले वास्तविक वैज्ञानिक निर्देशानुसार, भगवान ब्रह्मा द्वारा प्रियव्रत को दिए गए इस निर्देश का पालन करना चाहिए| इसकी पुष्टि भगवद गीता (16.23) में भी की गई है:

यः शास्त्र-विधिम उतृज्य

वर्तते काम-कारतः

न स सिद्धिम अवानोति

ना सुखं ना परां गतिम्

अगर हम शास्त्रों, वेदों की आज्ञाओं के अनुसार नहीं रहते हैं, तो हम जीवन में कभी भी सफलता हासिल नहीं कर पाएंगे, जीवन के उच्च दर्जे पर ऊपर उठने या खुश रहने की तो बात ही छोड़िए|

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)