श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  5.1.13 
भवाय नाशाय च कर्म कर्तुं
शोकाय मोहाय सदा भयाय ।
सुखाय दु:खाय च देहयोग-
मव्यक्तदिष्टं जनताङ्ग धत्ते ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रियव्रत, परमेश्वर की आज्ञा से ही सभी जीवित प्राणी अलग-अलग प्रकार के शरीर धारण करते हैं। ये शरीर जन्म और मृत्यु, क्रियाकलाप, विलाप, भ्रम, भविष्य के खतरों का डर और सुख-दुख के लिए होते हैं।
 
O Priyavrata, by the Lord's order all living souls take different types of bodies for birth, death, karma, grief, attachment, fear of future troubles, happiness and sorrow.
तात्पर्य
इस भौतिक संसार में आने वाला हर जीव भौतिक आनंद के लिए आया है, लेकिन उसके अपने कर्म, कार्यो के अनुसार, उसे भौतिक प्रकृति द्वारा परम व्यक्तित्व भगवान के आदेश के तहत दिए गए एक निश्चित प्रकार के शरीर को स्वीकार करना होगा। जैसा कि भगवद-गीता (3.27) में कहा गया है, "प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:" : सब कुछ प्रकृति, भौतिक प्रकृति द्वारा, परम प्रभु के निर्देशन में किया जा रहा है। आधुनिक वैज्ञानिकों को नहीं पता कि 8,400,000 रूपों में शरीर की किस्में क्यों हैं। तथ्य यह है कि ये सभी शरीर परम व्यक्तित्व भगवान द्वारा जीवों की इच्छाओं के अनुसार निर्धारित किए जाते हैं। वह जीवों को अपनी इच्छानुसार कार्य करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन दूसरी ओर उन्हें अपनी गतिविधियों की प्रतिक्रियाओं के अनुसार एक शरीर स्वीकार करना होगा। इस प्रकार अलग-अलग प्रकार के शरीर होते हैं। कुछ जीवों का जीवन काल छोटा होता है, जबकि अन्य बहुत लंबे समय तक जीवित रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति, ब्रह्मा से लेकर चींटी तक, परम व्यक्तित्व भगवान के निर्देशन के अनुसार कार्य करता है, जो प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में विराजमान है। जैसा कि भगवद-गीता (15.15) में पुष्टि की गई है:

"सर्वस्य चहं हृदि सन्निविष्टो

मत: स्मृतिर् ज्ञानम् अपोहनम् च"

"मैं प्रत्येक के हृदय में विराजमान हूँ, और मुझसे स्मृति, ज्ञान और विस्मरण आता है।" हालाँकि, यह सच नहीं है कि परम व्यक्तित्व भगवान कुछ जीवों को एक तरह से निर्देशन देते हैं और अन्य जीवों को दूसरे तरीके से। सच्चाई यह है कि प्रत्येक जीव की एक निश्चित इच्छा होती है, और परम प्रभु उसे इसे पूरा करने का मौका देते हैं। इसलिए, सबसे अच्छा मार्ग है परम व्यक्तित्व भगवान के समक्ष समर्पण करना और उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करना। वह जो ऐसा करता है वह मुक्त हो जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)