श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.1.12 
न तस्य कश्चित्तपसा विद्यया वा
न योगवीर्येण मनीषया वा ।
नैवार्थधर्मै: परत: स्वतो वा
कृतं विहन्तुं तनुभृद्विभूयात् ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
कोई भी भगवान के आदेशों की अवहेलना नहीं कर सकता, न ही तपोबल से, न वैदिक शिक्षा से, न योगबल से, न शारीरिक बल से और न बुद्धिबल से। कोई भी अपने धर्म की शक्ति से, अपनी भौतिक संपत्ति से या किसी अन्य उपाय से, न तो स्वयं और न दूसरों की सहायता से, परमात्मा के आदेशों की अवहेलना नहीं कर सकता। ब्रह्मा से लेकर चींटी तक, कोई भी जीव ऐसा नहीं कर सकता।
 
No one can avoid the command of God by the power of penance, Vedic education, yogic power, physical strength or intellectual power, nor can anyone challenge the orders of God by the power of his religion or material wealth or by any other means, neither by himself nor with the help of others. It is not possible for any living being, from Brahma to an ant, to do so.
तात्पर्य
बृहद-अरण्यक उपनिषद (3.8.9) में, याज्ञवल्क्य, गार्गी मुनि की पुत्री गार्गी से कहते हैं, ""हे गार्गी, यह सब परमात्मा के नियंत्रण में है। सूर्य, चंद्रमा और भगवान ब्रह्मा और राजा इंद्र जैसे अन्य नियंत्रक और देवता भी उनके नियंत्रण में हैं।"" एक साधारण मानव या जानवर जिसने भौतिक शरीर स्वीकार कर लिया है, वह परमेश्वर के नियंत्रण के क्षेत्र से परे नहीं जा सकता। एक भौतिक शरीर में इंद्रियाँ शामिल होती हैं। हालाँकि, ईश्वर के नियमों या प्रकृति के नियमों से मुक्त होने का प्रयास करने वाले तथाकथित वैज्ञानिकों की इंद्रिय गतिविधियाँ बेकार हैं। इसकी पुष्टि भगवद-गीता (7.14) में भी की गई है। मामा माया दुर्त्यया: भौतिक प्रकृति के नियंत्रण को पार करना असंभव है, क्योंकि परमेश्वर इसके पीछे काम कर रहे हैं। कभी-कभी हमें अपनी तपस्याओं, तपस्याओं और रहस्यमय योग शक्तियों पर गर्व होता है, लेकिन यह यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई भी रहस्यमय शक्ति, वैज्ञानिक शिक्षा, या तपस्या और तप के बल पर परमेश्वर के नियमों और निर्देशों को पार नहीं कर सकता। यह असंभव है। ""मनिस्या"" (""बुद्धि द्वारा"") शब्द का विशेष महत्व है। प्रियव्रत यह तर्क दे सकते हैं कि भगवान ब्रह्मा उनसे पारिवारिक जीवन और राज्य पर शासन करने की जिम्मेदारी स्वीकार करने का अनुरोध कर रहे थे, जबकि नारद मुनि ने उन्हें गृहस्थ जीवन में प्रवेश न करने और भौतिक मामलों में उलझने की सलाह दी थी। प्रियव्रत के लिए किसको स्वीकार करना एक पहेली होगी क्योंकि भगवान ब्रह्मा और नारद मुनि दोनों ही अधिकारी हैं। परिस्थितियों में, ""मनिस्या"" शब्द का उपयोग बहुत उपयुक्त है, क्योंकि यह इंगित करता है कि चूँकि नारद मुनि और भगवान ब्रह्मा दोनों को निर्देश देने के लिए अधिकृत किया गया है, प्रियव्रत को उनमें से किसी की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपनी बुद्धि का उपयोग दोनों की सलाह का पालन करने के लिए करना चाहिए। ऐसी दुविधाओं को हल करने के लिए, श्रील रूप गोस्वामी ने बुद्धि की एक बहुत स्पष्ट अवधारणा दी है। वे कहते हैं:

अनासक्तस्य विषयान

यथारहम उपयुंजत:

निर्बंध: कृष्ण-संबंधे

युक्तं वैराग्यम उच्यते

विषयान, भौतिक मामलों, को बिना अनुराग के स्वीकार किया जाना चाहिए, और सब कुछ प्रभु की सेवा से जोड़ा जाना चाहिए। यही वास्तविक बुद्धि (मनिसा) है। भौतिक दुनिया में एक पारिवारिक व्यक्ति या राजा बनना हानिकारक नहीं है यदि कोई सब कुछ कृष्ण की सेवा के लिए स्वीकार करता है। इसके लिए स्पष्ट बुद्धि की आवश्यकता होती है। मायावादी दार्शनिक कहते हैं, ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या: यह भौतिक दुनिया मिथ्या है, और केवल परम सत्य ही वास्तविक है। हालाँकि, भगवान ब्रह्मा और महान ऋषि नारद - या, दूसरे शब्दों में, ब्रह्म-सम्प्रदाय के वंश में एक बुद्धिमान भक्त इस दुनिया को मिथ्या नहीं मानता है। जो सर्वोच्च व्यक्तित्व के भगवान द्वारा बनाया गया है वह झूठा नहीं हो सकता है, लेकिन इसका उपयोग आनंद के लिए है। भगवद-गीता (5.29) में पुष्टि के अनुसार, सर्वोच्च व्यक्तित्व के भगवान द्वारा सभी आनंद का आनंद लेने के लिए है। भोक्तारं यज्ञ-तपसां सर्व-लोक-महेश्वरम: सर्वोच्च व्यक्तित्व के भगवान सर्वोच्च स्वामी और भोक्ता है, और इसलिए सब कुछ उसके आनंद और सेवा के लिए जोड़ा जाना चाहिए। किसी की परिस्थितियाँ अनुकूल हों या प्रतिकूल, उसे सर्वोच्च भगवान की सेवा के लिए सब कुछ का उपयोग करना चाहिए। अपनी बुद्धि का उपयोग करने का यही सही तरीका है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)