अनासक्तस्य विषयान
यथारहम उपयुंजत:
निर्बंध: कृष्ण-संबंधे
युक्तं वैराग्यम उच्यते
विषयान, भौतिक मामलों, को बिना अनुराग के स्वीकार किया जाना चाहिए, और सब कुछ प्रभु की सेवा से जोड़ा जाना चाहिए। यही वास्तविक बुद्धि (मनिसा) है। भौतिक दुनिया में एक पारिवारिक व्यक्ति या राजा बनना हानिकारक नहीं है यदि कोई सब कुछ कृष्ण की सेवा के लिए स्वीकार करता है। इसके लिए स्पष्ट बुद्धि की आवश्यकता होती है। मायावादी दार्शनिक कहते हैं, ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या: यह भौतिक दुनिया मिथ्या है, और केवल परम सत्य ही वास्तविक है। हालाँकि, भगवान ब्रह्मा और महान ऋषि नारद - या, दूसरे शब्दों में, ब्रह्म-सम्प्रदाय के वंश में एक बुद्धिमान भक्त इस दुनिया को मिथ्या नहीं मानता है। जो सर्वोच्च व्यक्तित्व के भगवान द्वारा बनाया गया है वह झूठा नहीं हो सकता है, लेकिन इसका उपयोग आनंद के लिए है। भगवद-गीता (5.29) में पुष्टि के अनुसार, सर्वोच्च व्यक्तित्व के भगवान द्वारा सभी आनंद का आनंद लेने के लिए है। भोक्तारं यज्ञ-तपसां सर्व-लोक-महेश्वरम: सर्वोच्च व्यक्तित्व के भगवान सर्वोच्च स्वामी और भोक्ता है, और इसलिए सब कुछ उसके आनंद और सेवा के लिए जोड़ा जाना चाहिए। किसी की परिस्थितियाँ अनुकूल हों या प्रतिकूल, उसे सर्वोच्च भगवान की सेवा के लिए सब कुछ का उपयोग करना चाहिए। अपनी बुद्धि का उपयोग करने का यही सही तरीका है।
